Badrinath Dham

Badrinath Dham

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यु तो सम्पूर्ण भारत देश आदि काल से ही आध्यात्मिक स्थल और संतो की भूमि रहा है, और भारत के ही उत्तराखंड राज्य को देवभूमि के नाम से जाना जाता है जहाँ माँ गंगा, माँ पार्वती से लेकर भगवान शिव, भगवान विष्णु ने विभिन्न अवतारों के रूप में अपना कर्म स्थल व ध्यान स्थल के रूप में उत्तराखंड का चयन किया आज जिस पवित्र और पौराणिक स्थल बद्रीनाथ के बारे में आप इस वीडियो में जानेंगे वो ना केवल उत्तराखंड के चार धामों गंगोत्री (गंगा नदी का उद्गम स्थल), यमुनोत्री (यमुना नदी का उद्गम स्थल), केदारनाथ शिव ज्योतिर्लिंग) में सम्मिलित है बल्कि भारत के चार धामों जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम, द्वारका के साथ चौथे धाम के रूप में भी जाना जाता है।
इस पोस्ट में आप जानेंगे बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास और यहाँ से जुड़े तथ्यों, यहाँ कैसे पहुंचे, कब आएं, कैसे आएं, कहाँ ठहरे आदि की जानकारियां… और करेंगे बद्रीनाथ मंदिर का दर्शन।

बद्रनाथ धाम : हिमालय के शिखर पर स्थित बद्रीनाथ मंदिर हिन्दुओं की आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है। बद्रीनाथ मंदिर उत्तराखंड राज्य में चमोली जिले में जिला मुख्यालय चमोली से १०० किलोमीटर की दुरी पर अलकनंदा नदी के किनारे बसा है। मूल रूप से यह धाम विष्णु के नारायण रुप को समर्पित है।। बद्रीनाथ मंदिर को आदिकाल से स्थापित माना जाता है।

बद्रीनाथ मंदिर के कपाट प्रतिवर्ष अप्रैल के अंत या मई के प्रथम पखवाड़े में दर्शन के लिए खोल दिए जाते हैं। कपाट के खुलने के समय मन्दिर में अखण्ड ज्योति को देखने को बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का तांता रहता है।

लगभग 6 महीने तक पूजा- अर्चना चलने के बाद शीतकाल में नवंबर के आस पास मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। शीतकाल में यह धम 10 से 15 फीट बर्फ से ढक जाता है।शीतकाल में बदरीनाथ जी की पूजा 55 किमी दूर नृसिंह मंदिर जोशीमठ में होती है।

देश के चार धामों में से एक श्री बद्रीनाथ और बद्रीनारायण मंदिर आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा प्रतिष्ठित देश में चार पवित्र धामों में से एक श्री बद्रीनाथ धाम पवित्र अलकनंदा नदी के किनारे उत्तराखंड में चमोली जिले में स्थित हैं. यह 2,000 वर्ष से भी अधिक समय से एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान रहा है पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह 12 धाराओं में बंट गई। इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई और यह स्थान बदरीनाथ, भगवान विष्णु का वास बना।

मन्दिर प्रातः चार बजे खुलता है।इसके बाद मुख्यपुजारी स्नान करने के बाद इसका श्रंगार व अभिषेक करते हंैं। इसके बाद यहां दर्शन का क्रम शुरू होता है। 12 बजे दोहपर में आरती के बाद मन्दिर सांय चार बजे तक बंद रहता है।इस बीच में दिन में मूर्ति को भोग लगाया जाता है।सायं चार बजे मन्दिर फिर खुलता है और सायंकालीन आरती के बाद रात्रि 8 बजे बंद होता है।

मन्दिर के प्रवेश यानि सिंह द्वार के समीप गरुड़ की मूर्ति है जो कि विष्णु के वाहन हैं। परिक्रमा पथ पर गणेश जी की मूर्ति है। कपाट खुलने पर पहली पूजा गणेश जी की होती है।मन्दिर के परिक्रमा पथ में दक्षिणमुखी हनुमान की मूर्ति है। परिसर में ही महालक्ष्मी जी का मन्दिर है।जब नारायण यहां पर तपस्यारत थे लक्ष्मी जी ने बदरी की झाड़ी के रूप में उनको संरक्षण प्रदान किया था।अन्दर ही शंकराचार्य की गद्दी है जो कपाट बंद होने पर जोशीमठ में 6 माह के लिये स्थापित की जाती है व खुलने पर इसे मन्दिर परिसर में स्थापित किया जाता है।

मदिर में वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है। जहाँ से आपको बद्रीनाथ मंदिर के दिव्य दर्शन होते हैं… ये मंदिर के पीछे पहाड़ियों का दृश्य जहाँ सूरज की किरने और साफ़ वातावरण आपका मन मोह लेता हैं.

मंदिर के दर्शन करने के लिए श्रध्हलुओं के लगी लाइन… और यहाँ पर लाइन में खड़े दर्शानार्थियों धुप व बारिश से बचाव के लिए लगी टिन के शेल्टर… श्रद्धालु यहाँ लाइन में लग दर्शन के लिए अपनी बारी का इंतेजार करते हैं… और जय विष्णु का जय जयकार लगाते हैं… पर इश्वर के दर्शन के लिए ये इन्तेजार आपको ना ही निराश करता हैं और थकाता नहीं है। बद्रीनाथ मंदिर के पीछे नीलकंठ चोटी के साथ, यह नर और नारायण चोटियों स्थित है।





बदरीधाम कैसे पहुचे:
बदरीधाम तक आप देश के किसी भी हिस्से से हरिद्वार, ऋषिकेश होते हुए पहुच सकते हैं, इसके सबसे करीबी रेलवे स्टेशन गडवाल में ऋषिकेश है और और हवाई अड्डा जॉली ग्रांट जो की देहरादून के निकट स्थित है. यहाँ के लिए हरिद्वार ऋषिकुल मैदान से और ऋषिकेश में चंद्रभागा बस स्टैंड से यातायात के साधन जैसे बस या टैक्सी इत्यादि मिल जाते हैं।

देहरादून से बद्रीनाथ की दुरी 335 किलोमीटरस, हरिद्वार से 315 km और ऋषिकेश से क्रमशः 295 km, new delhi se 526 km
kumaon mei kathgodam railway station se 330 km
(kathgodam – bhimtal – bhowali – kherna – ranikhet – dwarahat – chaukhutia – aadibadri – Karnprayag – langasu – nandprayag – chamoli – pepalkoti – joshimath – govind ghat pandukeshwar – hote hue pahucha jaa sakta hai

उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र से, नजदीकी रेलवे स्टेशन काठगोदाम,

dehradun se doiwala – rishikesh – devprayag – shrinagar – rudrapryag – gauchar – karnprayag – langasu – karnprayag – chamoli – pipalkoti hote hue badrinath – 335 km

hariwar se rishikesh – devprayag – srinagar – aur baaki soute same — 315 km

kedarnath se – gaurikund – phata – ukimath- agastmuni – rudraprayag – gauchar – karnprayag- langasu – nandprayag- chamoli – pipalkoti- joshimath – pandukeshwar hote hue badrinath pahucha ja sakta hai – dono dhamo kee duri sadak marg dwara 225 kilometer hai aur tay karne mei lagne waala samay 8 se 10 ghanta

इन सड़क मागों के अलावा अब हवाई मार्ग से भी बदरीनाथ आया जा सकता है जिसके लिये देहरादून, हरिद्वार, एवं गौचर से चार्टेड हेलीकाप्टर सेवायें चलती हैं।

बद्री धाम के कपट खुलने का समय/ कब आयें – बद्रीधाम प्रतिवर्ष अप्रैल

समुद्र तल से लगभग 3300 मीटर (10,827 feet) की ऊंचाई पर श्री बद्रीनाथ धाम में वर्ष में लगभग छह महीने नवम्बर से अप्रैल तक, बर्फ से ढका रहता इसलिए शेष छह माह ही तीर्थयात्रियों के लिए खुलता हैं… और शीतकाल में बर्फ़बारी के चलते बदरीधाम के कपाट बंद होने के बाद बद्री विशाल को नरसिम्हा मंदिर जोशीमठ में प्रतिस्थापित कर दिया जाता है

मंदिर के कपाट बंद होने की यह है प्रथा
भक्तों को दर्शन दे रहे चारधामों में बैठे भगवान शीतकालीन दिनों के लिए अपने-अपने धामों से चले जाते हैं। दरअसल सर्दियों में इन मंदिरों तक जाने वाले मार्ग बर्फ से ढंक जाते हैं। चारों धाम तक जाने वाले रास्ते पूरी तरह से बंद हो जाते हैं। इसलिए भक्तों को दर्शन देने के लिए मंदिर में विराजमान भगवान धाम से छह महीने के लिए दूसरी जगह विराजते हैं।

जैसे गंगोत्री धाम मुखबा गांव, यमुनोत्री को खरसाली , केदारनाथ के उखीमठ, बद्रीनाथ नरसिम्हा मंदिर जोशीमठ में दर्शन किये जा सकते हैं

बद्रीनाथ के बारे में और बद्रीनाथ का इतिहास पंच-बदरी में से एक बद्री हैं। उत्तराखंड में पंच बदरी, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिन्दू धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

पौराणिक कथाओं और यहाँ की लोक कथाओं के अनुसार यहाँ नीलकंठ पर्वत के समीप भगवान विष्णु ने बाल रूप में अवतरण किया। यह स्थान पहले शिव भूमि (केदार भूमि) के रूप में व्यवस्थित था। भगवान विष्णुजी अपने ध्यानयोग हेतु स्थान खोज रहे थे और उन्हें अलकनंदा नदी के समीप यह स्थान बहुत भा गया।

उन्होंने वर्तमान चरणपादुका स्थल पर (नीलकंठ पर्वत के समीप) ऋषि गंगा और अलकनंदा नदी के संगम के समीप बाल रूप में अवतरण किया और क्रंदन करने लगे। उनका रुदन सुन कर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा। फिर माता पार्वती और शिवजी स्वयं उस बालक के समीप उपस्थित हो गए। माता ने पूछा कि बालक तुम्हें क्या चहिये? तो बालक ने ध्यानयोग करने हेतु वह स्थान मांग लिया। इस तरह से रूप बदल कर भगवान विष्णु ने शिव-पार्वती से यह स्थान अपने ध्यानयोग हेतु प्राप्त कर लिया। यही पवित्र स्थान आज बदरीविशाल के नाम से सर्वविदित है।





बदरीनाथ नाम की कथा
जब भगवान विष्णु योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे, शीतऋतू में बहुत अधिक हिमपात होने लगा। भगवान विष्णु हिम में पूरी तरह डूब चुके थे। उनकी इस दशा को देख कर माता लक्ष्मी का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े हो कर एक बेर (बदरी) के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगीं।

माता लक्ष्मीजी भगवान विष्णु को धूप, वर्षा और हिम से बचाने की कठोर तपस्या में जुट गयीं। कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा कि लक्ष्मीजी हिम से ढकी पड़ी हैं। तो उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देख कर कहा कि हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है सो आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा और क्योंकि तुमने मेरी रक्षा बदरी वृक्ष के रूप में की है सो आज से मुझे बदरी के नाथ-बदरीनाथ के नाम से जाना जायेगा। इस तरह से भगवान विष्णु का नाम बदरीनाथ पड़ा।

जहाँ भगवान बदरीनाथ ने तप किया था, वही पवित्र-स्थल आज तप्त-कुण्ड के नाम से विश्व-विख्यात है और उनके तप के रूप में आज भी उस कुण्ड में हर मौसम में गर्म पानी उपलब्ध रहता है।

बद्रीनाथ धाम के बारे में एक और कथा कहती है कि नर और नारायण; धरम के दो पुत्र थे, जो अपने आश्रम की स्थापना की कामना करते थे| और विशाल हिमालय पर्वतों के बीच कुछ सौहार्दपूर्ण स्थान पर अपने धार्मिक आधार का विस्तार करना चाहते थे। नर और नारायण वास्तव में दो आधुनिक हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के लिए पौराणिक नाम हैं।

कहा जाता है कि, जब वे अपने आश्रम के लिए एक उपयुक्त जगह की तलाश का कर रहे थे तो, उन्होंने पंच बद्री की अन्य चार स्थलों पर ध्यान दिया अर्थात् ब्रिधा बद्री, ध्यान बद्री, योग बद्री और भविष्य बद्री। अंत में अलकनंदा नदी के पीछे गर्म और ठंडा वसंत मिला और इसे बद्री विशाल का नाम दिया गया| इसी तरह बद्रीनाथ धाम अस्तित्व में आया।

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By |2018-08-11T12:57:12+00:00August 4th, 2018|Categories: Places|Tags: |0 Comments

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