हल्द्वानी की कहानी। Haldwani – explore the city

हल्द्वानी शहर, जो कि नैनीताल जिले मे स्थित हैं और उत्तराखंड के बड़े शहरों मे से एक हैं, से आप परिचित होंगे ही। शहर को ‘हल्द्वानी’ नाम कैसे मिला? पहले कैसा था हल्द्वानी, ब्रिटीशेर्स से पहले कौन शासन करता था, और हल्द्वानी में मुगल क्यों नहीं कर सकें अधिकार, सहित देखिये शहर हल्द्वानी की दिलचस्प कहानी।




जानिये हल्द्वानी शहर को #Haldwani (Distt: #Nainital), Gateway To Kumaon #Uttarakhand, A short film on Haldwani, Know a few interesting facts, history, geography, tour the city. The story of a city.
Main Roads in Haldwani as Kaladhungi Road, Rampur Road, Bareilly Road, Nainital Road.
Main Crossing – Kaladhungi Chauraha, Educational institution in Haldwani, Hospitals, streets.
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रानीखेत से भवाली

इस मार्ग में सड़क के किनारे पेराफीट का कलर कॉम्बिनेशन ये अहसास कराते हैं कि – आप आर्मी एरिया में हैं. देवदार, बांज बलूत और चीड के वृक्षों से घिरा ये क्षेत्र है रानीखेत का।

रानीखेत जिसे – क्वीन’स मीडो (queen’s meadow) भी कहते हैं – उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले का एक बहुत ही खुबसूरत हिल स्टेशन और छावनी क्षेत्र है।

रानीखेत अपनी प्राकर्तिक खूबसूरती, यहाँ से दिखने वाले विशाल हिमालय श्रंखला, यहाँ के मंदिरों, यहाँ स्थित गोल्फ कोर्स, और खुबसूरत खेतों के लिए सभी का मन जीत लेता है।




सुंदर घाटियां, चीड़ और देवदार के ऊंचे-ऊंचे पेड़, शहरी कोलाहल तथा प्रदूषण से दूर अद्भुत सौंदर्य आकर्षण का केन्द्र है। यहाँ, निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम से भवाली, खैरना होते हुए लगभग 80 किलोमीटर की दुरी तय कर पंहुचा जा सकता है।

तो चल पड़िए आप भी इस रानीखेत से भवाली के सफ़र में हमारे साथ डूबते उबरते रहिये अपने अहसासों और यादों के समुन्दर में।

नमस्कार viwers आपका स्वागत है तहे दिल से, popcorn trip की … इस विडियो में हम बात करेंगे यहाँ के कुछ इतिहास, कुछ वर्तमान, कुछ भूगोल, कुछ facts, कुछ सामान्य जानकारी के बारे में और साथ ही जानेंगे और देखेंगे रानीखेत से भवाली तक पड़ने वालें कुछ पहाड़ी कस्बो को, और साथ ही आनंद लेंगे ढेर सारी प्राकर्तिक खूबसूरती का।

अल्मोड़ा/ मझखाली या द्वाराहाट से आते हुए रानीखेत बाजार से पहले आपको इस जगह से दो मार्ग दीखते हैं, राईट हैण्ड साइड वाला रानीखेत मुख्य बाजार से होते हुए और लेफ्ट हैण्ड साइड वाला मार्ग मॉल रोड छावनी छेत्र से होते हुए चिलियानौला के समीप आपस में मिल जातें हैं, हमने ट्रैफिक congesstion से बचने के लिए left हैण्ड वाला मार्ग जो माल रोड होते हुए जाता है वो मार्ग चुना।

छावनी होने से रानीखेत का ये इलाका काफी साफ़ सुथरा, शांत और व्यवस्थित है. स्वच्छता सर्वेक्षण 2018 के अनुसार रानीखेत दिल्ली और अल्मोड़ा छावनियों के बाद भारत की तीसरी सबसे स्वच्छ छावनी है।





ये यहाँ मॉल रोड स्थित पोस्ट ऑफिस, और military हॉस्पिटल. यहाँ की रिहायशी इलाका नीचे दाहिनी और की और मार्ग सदर बाजार और चिलियानौला के लिए है।

अपर माल रोड से जाने का चार्ज टैक्सी आदि के लिये १० रूपया और प्राइवेट वाहनों के लिये २० रूपया है अपर माल रोड से रानिखेत से यहाँ के दुरी 2.5 किलोमीटर और वाया चिल्यानौअला ६ किलोमीटर है
रानीखेत मॉल रोड स्थित छावनी छेत्र से आगे बढ़ ये मार्ग है रानीखेत – भवाली मोटर मार्ग
बायीं ओर पिलखोली स्थित घट घटेश्वरी मंदिर का प्रवेश द्वार
Ranikhet – se लगभग 11 किलोमीटर एक और चुंगी नाका, यहाँ पर हल्द्वानी से आने वाले वे वाहन जिन्हें मॉल रोड से होकर जाना है उन्हें छावनी परिसर में प्रवेश करने का शुल्क देना होता है . जो की वर्तमान में ३० रुपया है,

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रानीखेत का पिन कोड है – 263645
और STD कोड है 05966

sea लेवल से height – 6132 feet (1869 m) -Ranikhet
2,084 m (Nainital) & 1,642 m (Almora)

मनोरम पर्वतीय स्थल रानीखेत लगभग 25 वर्ग किलोमीटर में फैला है। कुमाऊं क्षेत्र में पड़ने वाले इस स्थान से लगभग 400 किलोमीटर लंबी हिमाच्छादित पर्वत-श्रृंखला का ज़्यादातर भाग दिखता हैं।
छावनी का यह शहर अपने पुराने मंदिरों के लिए मशहूर है।




कहा जाता है कि सैकड़ों वर्ष पहले कोई रानी अपनी यात्रा पर निकली हुई थीं। इस क्षेत्र से गुजरते समय वह यहां के प्राकृतिक सौंदर्य से मोहित होकर रात्रि-विश्राम के लिए रुकीं। बाद में उन्हें यह स्थान इतना अच्छा लगा कि उन्होंने यहीं पर अपना स्थायी निवास बना लिया। चूंकि तब इस स्थान पर छोटे-छोटे खेत थे, इसलिए इस स्थान का नाम ‘रानीखेत’ पड़ गया। दुनिया भर से हर साल लाखों की संख्या में सैलानी यहां मौज-मस्ती करने के लिए आते हैं।

क्योंकि रानीखेत कुमाऊं रेजिमेन्ट का मुख्यालय है, इसलिए यह पूरा क्षेत्र काफ़ी साफ-सुथरा रहता है। cant area होने के कारण यहाँ किसी भी प्रकार का निर्माण प्रतिबंधित है
रानीखेत – उपराडी – बजीना, बजोल, बम्स्युं, पातली, भुजान – खैरना

उपराडी में 4 व्हीलर्स को छावनी परिसद के लिए टोल टैक्स देना होता है,
साफ़ मौसम, गुनगुनी धुप के साथ हलकी सर्द हवाएं मौसम को सुहावना बना रही है
ये न ख़तम होने वाले रस्ते, रास्तो में कहते मुसाफिर, कौन कमबख्त चाहता है ये सफ़र ख़तम हो… इन रास्तो में चलते आपके साथ पेड़, नदी और ये पहाड़ियां… इसीलिए उत्तराखंड टूरिज्म के baseline है Simply Heaven
हाँ पर एस हेवन में यहाँ होना सिम्पल नहीं है ये amazing और अतुलनीय भी है
रानीखेत से खेरना 29 किलोमीटर

रानीखेत के आस पास के आकर्सन – हैडाखान आश्रम, चौबटिया apple गार्डन, दूनागिरी मंदिर, गोल्फ कोर्स, माल रोड, सोहनी बिनसर आदि हैं
और यहाँ के अधिकतर निर्माण अंग्रेजों के समय के हैं’. यहाँ कुछ वर्ष पूर्व रानी lake का निर्माण कराया गया,
रानीखेत शहर से अल्मोड़ा मार्ग में लगभग 5 किलोमीटर की दुरी पर चीड़ के घने जंगल के बीच विश्व प्रसिद्ध गोल्फ मैदान है। उसके पास ही कलिका में कालीदेवी का प्रसिद्ध मंदिर भी है। मजखाली, चौबटिया (10 km), चिलियानौला (6 किलोमीटर) स्थित हेडाखान बाबा का भव्य मंदिर खासतौर से देखने लायक है। खडी बजार, आशियाना पार्क जो की जंगल थीम पर बना आकर्सन का केंद्र है , आर्टिफीसियल रानी झील यहाँ के कुछ प्रमुख , आकर्सन है, बिनसर महादेव – भगवन शिव को समर्पित मंदिर बिनसर महादेव भी यहाँ से कुछ दुरी पर ताडीखेत होते हुए स्थित है।




रानीखेत देश से सभी प्रमुख स्थानों से सड़क मार्ग द्वारा कनेक्टेड है कुछ प्रमुख स्थानों जैसे दिल्ली, देहरादून, चंडीगढ़, आदि से दुरी आप स्क्रीन में देख सकते हैं
नजदीकी रैलवे स्टेशन काठगोदाम ८० किलोमीटर, हवाई अड्डा पंतनगर १३५ किलोमीटर पंतनगर में है. रानीखेत की दूरी नैनीताल से 63 किमी, अल्मोड़ा से 50 किमी, कौसानी से 85 किमी और काठगोदाम से 80 किमी हैं।

रानीखेत सदर बाजार,
रानीखेत के प्राकर्तिक सुन्दरता किसी का भी मन मोह लेती है

रानीखेत से भवाली मार्ग को कुमाओं के बेहतरीन मार्गो में कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, मार्ग के एकंऔर पहाड़ी और दूसरी और ढलान, कभी कभी दिखती नदी, बीच में पड़ते छोटे छोटे गांव जहाँ स्ठित दुकाने, घर और आबादी आपका मन बरबस अपनी और आकर्षित कर लेती हैं,
अगर आप खुद राइड या ड्राइव कर रहें हो तो आपके लिए ये सुझाव है कि अपने वाहन की गति धीमी और नियंत्रित सीमा में ही रखे, क्युकी इन साफ़ हवाओं में साँसे लेना का मौका आपको बार बार नहीं मिलेगा, और ना ही मिलेगा इतना मनलुभावन दृश्यों से परिपूर्ण मार्ग
यहाँ इस मार्ग में आपको कई जगह कुछ दुरी के अन्तराल टी & स्नैक्स और meal के लिए दुकाने मिलती रहती हैं… पहाड़ी मार्गो के बात हे अपने में निराली है, यहाँ का साफ़ वातावरण और ताजगी लिए हवाओं की खुशबू के सामने इत्र की खुसबू कहीं नहीं ठहरती.
ये घुमावदार मोड जिंदगी का अहसास कराते हुए , जहाँ आपको पता नहीं होता अगले पल क्या मिलेगा ऐसे ही इन मोड़ो से गुजरते वक़्त आपको पता नहीं होता की आपको क्या दिखेगा,
एक शायर की मशहूर चंद पंक्तियाँ भी हैं
सफ़र आसान रखना हो तो सामान कम रखिये
जिंदगी आसां रखनी हो तो अरमान कम रखिये

इन रास्तो में आपको हिंदी सिनेमा के कई नए पुराने गीत याद आयेंगे
जैसे युही कट जायेगा सफ़र साथ चलने से, कि मंजिल आएगी नजर साथ चलने से

युही चला चल राही, यु ही चला चल

आगे दिख रहे बोर्ड के मुताबिक हल्द्वानी की दुरी है ७२ किलोमीटर, काठगोदाम 67, नैनीताल 45 और भीमताल है ४२ किलोमीटर की दुरी पर GOPR3301

और फिर से साफ़ सुथरी सड़क, सड़क के किनारे खड़े वाहनों से पता लग रहा है कि यहाँ पर भी कोई restaurnat होगा

अगर आपने कार/ बाइक रेसिंग गेमिंग कभी खेला या देखा हो तो ये सामने दिख रही सड़क, सड़क के किनारे लगे parafit और पहाड़िया आपको किसी रेसिंग गेम का ध्यान दिलाते हैं.




देखने को बहुत कुछ मिलेगा सड़क से चलते हुए कभी सड़क के किनारे दुकान, कभी कोई रिहायशी घर तो कभी ऐसा घर जहाँ लोग नहीं रहते बस उनकी यादें रहती हैं, वो चले गए किसी बेहतर जिंदगी की तलाश में या फिर छोड़ गए अपना आसियान किसी मज़बूरी के कारण वो एक कुछ और चंद पंक्तियाँ याद आ गयी
कोई युहीं क्यों बेवफा हुआ होगा,
कुछ तो बुरा उसे भी लगा होगा

खैर सफ़र है जिंदगी, चलती रहती है, ठहरती कहाँ है, मंजिल में hmmm
मंजिल भी तो बदलते रहती है, ठहराव को अच्छा नहीं समझा जाता

यहाँ पर का दिख रहा दृश्य अल्मोड़ा – खैरना मार्ग के दृश्य से मिलता जुलता है, वैसी ही घुमावदार सड़क, दाहिनी हाथ को नदी और पहाड़ी

कैंची धाम यहाँ से 27 किलोमीटर की दुरी पर रह गया है, खैरना ७ किलोमीटर और भुजान २ किलोमीटर
पहाड़ों में आपको इस तरह से ४ – ५ ट्रक से ज्यादा ट्रक खड़े दिखाई दे तो समाझ जाईयेगा की वहां आस पास कही जल श्रोत होगा, अक्सर ट्रक ड्राइवर्स अपने ट्रक की साफ़ सफाई हेतु ट्रक रात्रि को ऐसे स्थान में खड़ा करते हैं. और ट्रक खड़े होंगे तो संभवतया आस पास कोई ढाबा भी होगा ही

और भुजान ही वह जगह है जहाँ से बेतालघाट को मार्ग जाता है, जिसकी दुरी यहाँ से — किलोमीटर है

ये सामने सड़क जो बेतालघाट को,

अब खैरना पुल से हम गुजर रहे हैं, यहाँ से लेफ्ट हैण्ड को मार्ग अल्मोड़ा के लिए, राईट हैण्ड को मार्ग हल्द्वानी व नैनीताल के लिए… और यहाँ से खैरना भी शुरू हो जाता है… यहाँ भी काफी बड़ी बाजार है, जहाँ लगभग हर तरह का जरुरी सामान मिल जाता है
यहाँ भी एक पेट्रोल पंप मौजूद है
और खैरना से ही लगा हुआ गरम पानी बाजार, यहाँ लेफ्ट हैण्ड साइड को हनुमान जी के मंदिर से लगा हुआ एक प्राकर्तिक जल श्रोत है, जिससे वर्ष भर चौबीसों घंटे पीने का पानी बहता रहता है

और गरम पानी से कुछ ६ सात किलोमीटर की दुरी पर स्थित रातिघाट, यहाँ पर भी छोटी सी बाजार है

अब ये रातिघट से १० किलोमीटर बाद है कैची धाम, स्क्रीन में दिख रहे suggestion link और नीचे डिस्क्रिप्शन में दिए लिंक द्वारा कैंची मंदिर का दर्शन कर सकते हैं, इस मंदिर से जुडी जानकारी देते रोचक विडियो का लिंक आपको स्क्रीन के उप्परी हिस्से और नीचे discriptoin में मिल जाएगा.

यहाँ से विश्व प्रसिद्द कैंची धाम की दुरी लगभग 20 किलोमीटर, जहाँ विस्व्प्रसिद्द मेला व भंडारा बाबा नीब करौरी जी की याद में प्रतिवर्ष १५ जून को मनाया जाता है
कैंची धाम से लगभग ७ किलोमीटर की दुरी पर है आज के सफ़र की मंजिल भवाली, और भवाली से कुछ पहले ये स्थान है निगलाट

भवाली के सीमा शुरू हो चुकी है, ये राईट हैण्ड साइड को पेट्रोल पंप, और यहाँ की बाजार,
रोडवेज बस डिपो है दाहिनी हाथ की दिशा में, जहाँ से आपको हल्द्वानी, या नैनीताल जाने के लिए बसेस आदि मिल जाएँगी.
और ये भवाली तिराहा जहाँ से राईट हैण्ड साइड का मार्ग नैनीताल को जाता है और वाया ज्योलीकोट होते हुए आप हल्द्वानी काठगोदाम इस मार्ग से भी जा सकते हैं और
और आपने भीमताल, सातताल, नौकुचियाताल, घोडाखाल, मुक्तेश्वर, रामगढ आदि जाना हो तो लेफ्ट हैण्ड का मार्ग आपको choose करना होगा .. जिससे हम आगे बढ़ रहे हैं.
करीब डेढ़ दो सौ मीटर आगे से फिर एक तिराहा आएगा, जहाँ से लेफ्ट का मार्ग रामगढ, मुक्तेश्वर, धानाचूली आदि के लिए जाता है… और आप रामगढ से और आगे बढेंगे तो ये मार्ग भी क्वारब में मिलेगा जहां से भी आप अल्मोड़ा, कौसानी, बिनसर आदि को जा सकते हैं
और सीधे करीब १०० मीटर आगे बढ़ के ये U turn जहाँ से सीधा मार्ग घोडाखाल को और U Turn लेता हुआ मार्ग भीमताल, सातताल, नौकुचियाताल, काठगोदाम, हल्द्वानी को जाता है




राजेश खन्ना अभिनीत किशोर कुमार द्वारा गया एक और गाना है
जिंदगी के सफ़र में गुजर जाते हैं जो मुकाम वो फिर नहीं आते, फिर नहीं आते
तो जिंदगी का तो पता नहीं पर जब भी आपका दिल करे अपनी जिंदगी के मुकामों में वापस आने का तो आप इस चैनल में हमारे द्वारा बनाये गए अलग अलग स्थानों से जुड़े जानकारी देते वीडियोस देख के अपनी बीती यादों में जा सकते हैं

अपना और अपने आस पास के लोगो का ख्याल रखें
फिर मुलाकात होगी किसी और सफ़र में या किसी और जगह की जानकारी देते विडियो में, इसी उम्मीद के साथ आपसे विदा,

Amazing Dashara (dussehra) Festival, दुनिया का अनूठा दशहरा अल्मोड़ा का।

दुनिया के इस अनोखे दशहरा महोत्सव का आनंद लें.. Dashara (Dussehra) Almora, दशहरा अल्मोड़ा, wonderful festival of the world, Goddess Durga Idols, Effigies of Ravan Dynasty #Almora #Dussehra #Festival #Uttarakhand
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Omkareshwar Temple, Ukhimath | ओम्कारेश्वर मंदिर, उखीमठ

इस वर्ष में 9 नवंबर को केदारनाथ के कपाट बंद होने के बाद ओम्कारेश्वर मंदिर उखीमठ में भगवान श्री केदारनाथ और मद महेश्वर की पूजा होगी, यहाँ पुरे वर्ष भगवान श्री ओम्कारेश्वर की पूजा होती हैं।

उखीमठ भारत के उत्तराखंड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित एक तीर्थ स्थल है। यह 1311 मीटर की ऊंचाई पर है और रुद्रप्रयाग से 41 किलोमीटर की दूरी पर है। सर्दियों के दौरान, केदारनाथ मंदिर और मध्यमहेश्वर से मूर्तियों (डोली) को उखीमठ रखा जाता है और छह माह तक उखीमठ में इनकी पूजा की जाती है। उषा (बाणासुर की बेटी) और अनिरुद्ध (भगवान कृष्ण के पौत्र) की शादी यहीं सम्पन की गयी थी। उषा के नाम से इस जगह का नाम उखीमठ पड़ा। सर्दियों के दौरान भगवान केदारनाथ की उत्सव डोली को इस जगह के लिए केदारनाथ से लाया जाता है। भगवान केदारनाथ की शीतकालीन पूजा और पूरे साल भगवान ओंकारेश्वर की पूजा यहीं की जाती है। यह मंदिर उखीमठ में स्थित है।





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i) https://youtu.be/oi68UwM5W8k (गोपेश्वर महादेव मंदिर)
ii) https://youtu.be/as0JQ0PoPLM (श्री केदारनाथ मंदिर)
iii) https://youtu.be/5w70xP_74-k (श्री बद्रीनाथ मंदिर)
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Ukhimath (also written Okhimath) is a small town and a Hindu pilgrimage site in Rudraprayag district, Uttarakhand, India. It is situated at an elevation of 1311 meters and at a distance of 41 km from Rudraprayag. During the winters, the idols from Kedarnath temple, and Madhyamaheshwar are brought to Ukhimath and worshipped here for six months. Ukhimath can be used as center destination for visiting different places located nearby, i.e. Madhmaheshwar (Second kedar), Tungnath (Third kedar) and Deoria Tal (a natural fresh water lake) and many other picturesque places. According to Hindu Mythology, Wedding of Usha (Daughter of Vanasur) and Anirudh (Grandson of Lord Krishna) was solemnized here. By name of Usha this place was named as Ushamath, now known as Ukhimath. King Mandhata penances Lord Shiva here. During winter the Utsav Doli of Lord Kedarnath is brought from Kedarnath to this place. Winter puja of Lord Kedarnath and year-round puja of Lord Omkareshwar is performed here. This temple is situated at Ukhimath which is at a distance of 41 km from Rudraprayag.




Ukhimath has many other ancient temples dedicated to several Gods and Goddesses such as Usha, Shiva, Aniruddha, Parvati, and Mandhata.[3] Situated on the road connecting Guptkashi with Gopeshwar, the holy town is mainly inhabited by the head priests of Kedarnath known as Rawals.

Ukhimath has an All India Radio Relay station known as Akashvani Ukhimath. It broadcasts on FM frequencies

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Delicious Jalebiya Almora Ki

अल्मोड़ा अपनी प्राकर्तिक सुंदरता के साथ और भी कई बातों के लिए जाना जाता है

जिनमे से एक नाम आते ही – मुँह में मिठास घुल जाती हैं। वो हैं – अल्मोड़ा में कारखाना बाजार स्थित जलेबियो की मशहूर दुकान, इस दुकान की स्थापना कुछ तक़रीबन 70-80 साल पहले – स्वर्गीय किशन दत्त जोशी जी ने की थी, उनकी विरासत को आज उनके पुत्र आगे बढ़ा रहे हैं.

अल्मोड़ा मशहूर जलेबियों की यह दुकान, ब्रैंडिंग स्ट्रैटेजिस्ट के लिए शोध का विषय हो सकता हैं कि – दुकान के बाहर आज भी कोई बोर्ड नहीं हैं, कही कोई ब्रांडिंग नहीं हैं.




फिर भी जब जलेबियो का आनंद लेने का मन हो, तो अल्मोड़ा के स्थानीय निवासीयो को पहला ध्यान इसी दुकान का आता हैं. और यहाँ बैठकर दूध या दही के साथ जलेबियाँ लेने पर तो इसका जायका और भी बढ़ जाता हैं।

हर उम्र के लोग आनंद लेते गरमागरम जलेबियो का, यहाँ नज़र आते हैं, दिलचस्प बात यह हैं कि – यहाँ आप जिन जलेबियों का स्वाद लेंगे – उन्हें अपने सामने बनते हुए देख सकते हैं, दिन भर यहाँ स्वादिष्ट जलेबियाँ बनती रहती हैं – और हाथो हाथ बिक जाती हैं.




इस वीडियो को देखते हुए आया आपके में मुहं में पानी, तो आइये अल्मोड़ा और लीजिये खूबसूरत वादियों का आनंद साथ में माउथ मेल्टिंग जलेबिया,

आपको जलेबियाँ पसंद हों या वीडियो अच्छा लगा हो तो, लाइक का बटन दबायें – कमेंट कर बताएं आपके अनुभव, और अपने मित्रो को परिचित कराएं – अल्मोड़ा की एक डेलिकेसी से|

Mana Village

आज आप जानेंगे बद्रीनाथ धाम से तक़रीबन 4 किलोमीटर की दुरी पर भारत तिब्बत सीमा पर स्थित माणा गांव के बारे में…
viewers इसी चैनल में हम इसे पहले बद्रीनाथ धाम aur mana gaon की विस्तृत जानकारी देता वीडियो आपके लिए ला चुकें हैं jiska link aapko screen kee uppari hisse aur neeche discription mei bhi mil jaayega,
नमस्कार viewers, popcornTrip में आपका स्वागत हैं, इस वीडियो में जानेगे-
mana gaon, vyas gufa, bhim pul, vasu dhara aadi ke baare mein

बद्री धाम के कपट खुलने का समय/ कब आयें –

हिमालय में बद्रीनाथ से तीन किमी आगे समुद्रतल से 3111 मीटर की उचाई पर बसा गुप्त गंगा और अलकनंदा के संगम पर भारत-तिब्बत सीमा से लगे है भारत का अंतिम गाँव माणा।

बद्रीनाथ आने वाले श्रद्धालु माणा गाँव भी जरूर आते हैं, सड़क से लगभग आधा किलोमीटर पैदल चल कर यहाँ पंहुचा जा सकता हैं,

भारत की उत्तरी सीमा पर स्थित इस गाँव के आसपास कई दर्शनीय स्थल हैं जिनमें व्यास गुफा, गणेश गुफा, सरस्वती मन्दिर, भीम पुल, वसुधारा आदि मुख्य हैं।




माणा में कड़ाके की सर्दी पड़ती है। यह एक छोटा सा गांव है जहां के लोग मई से लेकर अक्तूबर तक इस गांव में रहते हैं, क्योंकि बाकी समय यह गांव बर्फ से ढका होता है। सर्दियां शुरु होने से पहले यहां रहने वाले ग्रामीण नीचे स्थित चमोली जिले के गाँवों में shift ho jaate हैं।

इस गांव में एक ऊंची पहाड़ी पर बहुत ही सुन्दर गुफा है, ऐसी मान्यता है कि व्यास जी इसी गुफा में रहते थे। व्यास गुफा के बारे में कहा जाता है कि यहीं पर वेदव्यास ने पुराणों की रचना की थी वर्तमान में इस गुफा में व्यास जी का मंदिर बना हुआ है।

व्यास गुफा को बाहर से देखकर ऐसा लगता है मानो कई ग्रंथ एक दूसरे के ऊपर रखे हुए हैं। इसलिए इसे व्यास पोथी भी कहते हैं।

व्यास गुफा के पास एक बोर्ड लगा है. ‘भारत की आखिरी चाय की दुकान’ जी हां, इसे देखकर हर सैलानी और तीर्थयात्री इस दुकान में चाय पीने के लिए जरूर रुकता है.




यहां से लगभग सौ दो सौ मीटर नीचे की और उतरने पर स्थित है भीमपुल
कहा जाता है कि जब पांडव स्वर्ग को जा रहे थे तो उन्होंने इस स्थान पर सरस्वती नदी से जाने के लिए रास्ता मांगा, लेकिन सरस्वती ने उनकी बात को अनसुना कर दिया और मार्ग नहीं दिया. ऐसे में महाबली भीम ने दो बड़ी शिलाएं उठाकर इसके ऊपर रख दीं, जिससे इस पुल का निर्माण हुआ. पांडव तो आगे चले गए और आज तक यह पुल मौजूद है.
यह भी एक रोचक बात है कि सरस्वती नदी यहीं पर दिखती है, इससे कुछ दूरी पर यह नदी अलकनंदा में समाहित हो जाती है. नदी यहां से नीचे जाती तो दिखती है, लेकिन नदी का संगम कहीं नहीं दिखता. इस बारे में भी कई मिथक हैं, जिनमें से एक यह है कि महाबली भीम ने नाराज होकर गदा से भूमि पर प्रहार किया, जिससे यह नदी पाताल लोक चली गई.
दूसरा मिथक यह है कि जब गणेश जी वेदों की रचना कर रहे थे, तो सरस्वती नदी अपने पूरे वेग से बह रही थी और बहुत शोर कर रही थी. आज भी भीम पुल के पास यह नदी बहुत ज्यादा शोर करती है. गणेश जी ने सरस्वती जी से कहा कि शोर कम करें, मेरे कार्य में व्यवधान पड़ रहा है, लेकिन सरस्वती जी नहीं मानीं. इस बात से नाराज होकर गणेश जी ने इन्हें श्राप दिया कि आज के बाद इससे आगे तुम किसी को नहीं दिखोगी.
वसुधारा- माणा से लगभग 5 किमी की दूरी पर बसुधारा प्रपात है यहां पर जलधारा 500 फीट की ऊंचाई से
गिरती है। ऐसा कहा जाता है कि जिसके ऊपर इसकी बूंदें पड़ जायें उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।




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धन्यवाद

सम्पूर्ण उत्तराखंड जिसे देवभूमि के नाम से जाना जाता है, जहाँ के हर हिस्से से कोई न कोई देवीय कथा जुडी हुई है, फिर चाहे वो कुमाऊँ हो या फिर गढ़वाल.
जहाँ कुमाऊँ में कई मंदिर हैं, वही गढ़वाल में चार धाम स्थित हैं, साथ ही हर भाग में कई ट्रैकिंग रूट मौजूद हैं.
हरिद्वार, ऋषिकेश, यमुनोत्री, गंगोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ, पाताल भुवनेश्वर, जगेशर, पूर्णागिरि, द्रोणागिरी जैसे धार्मिक स्थल हैं, तो राजाजी नेशनल पार्क, कॉर्बेट नेशनल पार्क, बिनसर एक सेंचुरी जैसे रिजर्व्ड फारेस्ट, गंगा, यमुना, अलकनंदा जैसे नदियों का उद्गम स्थल भी यही स्थित है… कई ऋषियों, मुनियो, और स्वयं साक्षात् इश्वर का ध्यान व तप स्थल भी उत्तराखंड रहा है

बदरीधाम कैसे पहुचे
चलिए पहले जान लेते हैं यहाँ कैसे पहुंचे
बदरीधाम तक आप देश के किसी भी हिस्से से हरिद्वार, ऋषिकेश होते हुए पहुच सकते हैं, देहरादून से बद्रीनाथ की दुरी 335 किलोमीटरस, हरिद्वार से 315 km और ऋषिकेश से क्रमशः 295 km, aur ek baar aap badrinath pahuch gaye to mana aap aasani se pahuch sakte hain
screen mei aaapko vibhinn hisso mana pahuche ke liye route chart dikh jayga
(kathgodam – bhimtal – bhowali – kherna – ranikhet – dwarahat – chaukhutia – aadibadri – Karnprayag – langasu – nandprayag – chamoli – pepalkoti – joshimath – govind ghat pandukeshwar – hote hue pahucha jaa sakta hai
dehradun se doiwala – rishikesh – devprayag – shrinagar – rudrapryag – gauchar – karnprayag – langasu – karnprayag – chamoli – pipalkoti hote hue badrinath – 335 km
hariwar se rishikesh – devprayag – srinagar – aur baaki soute same — 315 km
kedarnath se – gaurikund – phata – ukimath- agastmuni – rudraprayag – gauchar – karnprayag- langasu – nandprayag- chamoli – pipalkoti- joshimath – pandukeshwar hote hue badrinath pahucha ja sakta hai – dono dhamo kee duri sadak marg dwara 225 kilometer hai aur tay karne mei lagne waala samay 8 se 10 ghanta

इन सड़क मागों के अलावा अब हवाई मार्ग से भी बदरीनाथ आया जा सकता है जिसके लिये देहरादून, हरिद्वार, एवं गौचर से चार्टेड हेलीकाप्टर सेवायें चलती हैं।

शीतकाल में यहां के निवासी निचले इलाकों की ओर चले आते है और कपाट खुलने से साथ ही वहां पहुचते हैं। उनका एक समय भेड़ों का मुख्य कारोबार हुआ करता था।वे जड़ी बूटियां का संग्रहण व ऊनी वस्त्रों को बनाने का कार्य करते रहे हंै।

माण से पूर्व पहलंे सेना के कैम्प हैं।

व्यासगुफा एवं गणेष गुफा- बसुधारा सतोपंथ मार्ग पर व्यासगुफा है जहां रहकर ऋषि व्यास ने वेदों का सृजन किया। इसके समीप ही गणेश गुफा है।मान्यता है कि गणेश जी ने वेद व्यास के मुख से निकली वाणी को चैव्वन ग्रन्थों में लिपिबद्ध किया था।




भीमपुल- माणा से कुछ दूर सतोपंथ जाने वाले मार्ग पर कुछ दूर सरस्वती नदी है जो एक चट्टान के नीचे से गुजरती है।महाभारत युद्ध के बाद जब पाण्डव यहां से गुजर रहे थे राह में सरस्वती नदी के प्रवाहमान होने से उनका मार्ग अवरुद्ध होने पर भीम ने इस नदी पर एक भारी चट्टान को रखा जिसे भीम पुल जाना जाता है। दायीं हाथ की ओर का रास्ता तिब्बत सीमा के लिये चला गया है। उस ओर प्रवेश की मनाही है।

सतोपंथ (स्वर्गारोहिणी)- इस स्थान से राजा युधिष्ठिर ने सदेह स्वर्ग को प्रस्थान किया था।इसे धन के देवता कुबेर का भी निवास स्थान माना जाता है। यहां पर सतोपंथ झील है जो बदरीनाथ धाम से 24 किमी. दूर है। यहीं से अलकनंदा नदी का उद्गम होता है।इस मार्ग पर बर्फीली चोटियों के बीच से आकर कई हिमानियां नदी में मिलती है व इसका परिमाण बढ़ाती है।कई श्रद्धालु व पर्यटक सतोपंथ तक की कठिन यात्रा करते हंै और इसमें स्नान करते हैं।बदरीनाथ के अतिरिक्त चार अन्य बदरी मन्दिर आदिबदरी, योगबदरी, वृद्धबदरी, ध्यानबदरी हंै जिनका अपना महात्मय है।

उम्मीद है आपको श्री बदरीधाम से जुडी जानकारियां पसंद आयी होगी
आप सब का मंगल भगवान श्री विष्णु करें, इसी कामना के साथ विदा, फिर मुलाकात होती किसी और सफ़र YA KISI DESTINATION में धन्यवाद,

Dunagiri

दुनागिरि, पाण्डुखोली, भटकोट
प्रस्तावना
परिचय
इतिहास/ मान्यताएं
कैसे पहुचें, कहाँ रुकें, कब आयें, प्रमुख स्थानों से दूरियां
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आपका स्वागत है PopcornTrip चैनल के, दुनागिरि, पाण्डुखोली, और कुमाऊँ की सबसे ऊँची non हिमालयन peak भतकोट से जुडी जानकारी देते इस वीडियो में
उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में – द्वाराहाट से 14 किलोमीटर की दुरी पर हैं दुनागिरि, कुछ रेस्टोरेंट, डेली नीड्स के सामान से सम्बंधित दुकानो के साथ साथ प्रसाद इत्यादि के प्रतिष्ठान आप को सड़क से लगे हुए मिल जायेंगे

यहाँ इस जगह रानीखेत से द्वाराहाट होते हुए प हुचा जा सकता है। द्वाराहट से ५ किलोमीटर बाद कुकुछीना तक यहाँ से सड़क जाती है।

कुकुछीना से लगभग 4 किलोमीटर का ट्रेक करके सुप्रसिद्धि पाण्डुखोली आश्रम पंहुचा जा सकता जहाँ स्वर्गीय बाबा बलवंतगिरि जी ने आश्रम की स्थापना की थी, और पादुखोली, महावतार बाबा और लाहड़ी महाशय जैसे उच्च आध्यात्मिक संतो की तपस्थली रहा हैं । इसके बारे में विस्तार में इसी वीडियो में आगे करेंगे….




दुनागिरि मंदिर – उत्तराखंड और कुमाऊँ के प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में से एक है, दुनागिरि मंदिर के के लिए सीढ़ियों से चढ़कर उप्पर जाना होते हैं, और सीढ़ियों जहाँ शुरू होती हैं – वही प्रवेश द्वार से लगा हुआ हनुमान जी का मंदिर।

दुनागिरि मंदिर के दर्शन हेतु आने वाले श्रद्धालु इसी मार्ग से सीढ़ियां चढ़ कर दुनागिरि मंदिर तक पहुंचते हैं।

मंदिर तक ले जाने वाला मार्ग बहुत सुन्दर हैं, पक्की सीढिया, छोटे -२ स्टेप्स, जिसमे लगभग हर उम्र के लोग चल सकें, रस्ते के दोनों ओर दिवार और दिवार के उप्पर लोहे की रैलिंग लगी हैं, जिससे वन्य प्राणी और मनुष्य एक – दूसरे की सीमा को न लांघ सके.

मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 365 सीढ़ियां चढ़नी होती है | पूरा रास्ता टीन की छत से ढका हुआ है, जिससे श्रद्धालुओं का धुप और बारिश से बचाव होता है ।




मार्ग में कुछ कुछ दुरी पर आराम करने के लिए कुछ बेंचेस लगी हुई हैं। पूरे मार्ग में हजारों घंटे लगे हुए है, जो दिखने में लगभग एक जैसे है।

मां दुनागिरि के मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग 800 मीटर की दुरी पैदल चल के तय करनी होती हैं।

लगभग दो तिहाई रास्ता तय करने के बाद, ये है भंडारा स्थल है, जहा दूनागिरी मंदिर ट्रस्ट द्वारा प्रतिदिन भण्डारे का आयोजन किया जाता है। सुबह 9 बजे से लेकर दोपहर 3 बजे तक। जिसमें यहाँ आने वाले श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं।
दूनागिरी मंदिर रखरखाव का कार्य ‘आदि शाक्ति मां दूनागिरी मंदिर ट्रस्ट’ द्वारा किया जाता है।
प्रसादादि ग्रहण करने के बाद सभी श्रृदालु अपने बर्तन, स्वंय धोते हैं एवं डोनेशन बॉक्स में अपनी श्रदानुसार भेट चढ़ाते है – जिससे भंडारे का कार्यक्रम अनवरत चलता रहता है ।

इस जगह पर भी प्रसाद – पुष्प खरीदने हेतु कई दुकाने हैं.

मंदिर से ठीक नीचे एक ओर गेट हैं – श्रद्धालओं की सुविधा के लिए यहाँ से मंदिर दर्शन के लिए जाने वाले और दर्शन कर वापस लौट के आने वालों के लिए दो अलग मार्ग बने हैं.
देवी के मंदिर के पहले भगवान हनुमान, श्री गणेश व भैरव जी के मंदिर है ।

मंदिर में दर्शन करने के लिए समय निर्धारित है जो आप स्क्रीन में देख सकते हैं –

बायीं और लगभग 50 फ़ीट ऊंचा झूला जिसे पार्वती झूला के नाम से जाना जाता है।

मुख्य मदिर के निकट और मंदिर से पहले – बायीं और हैं गोलू देवता का मंदिर।
यहीं से दायी ओर – और भी मदिर है, और उप्पर सामने है मुख्य मंदिर। ये सामने मुख्य मंदिर से नीचे मार्ग के दोनों और माँ की सवारी शेर।
और अब हम हैं मुख्य मंदिर के ठीक सामने, आप लीजिये माँ के दर्शन का लाभ
मंदिर का आँगन में चौकोर टाइल्स है।




मंदिर की परिकर्मा करते हुए अब बात करते हैं – मदिर से जुड़े कुछ तथ्यों पर- दूनागिरी मुख्य मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है। प्राकृतिक रूप से निर्मित सिद्ध पिण्डियां माता भगवती के रूप में पूजी जाती हैं। दूनागिरी मंदिर में अखंड ज्योति का जलना मंदिर की एक विशेषता है।

दूनागिरी माता का वैष्णवी रूप में होने से इस स्थान में किसी भी प्रकार की बलि नहीं चढ़ाई जाती है। यहाँ तक की मंदिर में भेट स्वरुप अर्पित किया गया नारियल भी मंदिर परिसर में नहीं फोड़ा जाता है।

पुराणों, उपनिषदों और इतिहासविदों ने दूनागिरि की पहचान माया-महेश्वर व दुर्गा कालिका के रूप में की है। द्वाराहाट में स्थापित इस मंदिर में वैसे तो पूरे वर्ष भक्तों की कतार लगी रहती है, मगर नवरात्र में यहां मां दुर्गा के भक्त दूर-दराज से बड़ी संख्या में आशीर्वाद लेने आते हैं।
मंदिर की परिकर्मा करते हुए अब बात करते हैं यहाँ के इतिहास और यहाँ से जुडी मान्यताओं के बारे में
इतिहास/ मान्यताएं
इस स्थल के बारे में एक प्रचलित कथा के अनुसार यह कहा जाता है कि त्रेतायुग में जब लक्ष्मण को मेघनाद के द्वारा शक्ति लगी थी | तब सुशेन वेद्य ने हनुमान जी से द्रोणाचल नाम के पर्वत से संजीवनी बूटी लाने को कहा था | हनुमान जी आकाश मार्ग से पूरा द्रोणाचंल पर्वत उठा कर ले जा रहे तो इस स्थान पर पर्वत का एक छोटा सा टुकड़ा गिरा और फिर उसके बाद इस स्थान में दूनागिरी का मंदिर का निर्माण कराया गया |
एक अन्य मान्यता के अनुसार
गुरु द्रोणाचार्य ने इस पर्वत पर तपस्या की थी, जिस कारण उन्हीं के नाम पर इसका नाम द्रोणागिरी पड़ा और बाद में स्थानीय बोली के अनुसार दूनागिरी हो गया।




एक अन्य जानकारी के अनुसार कत्यूरी शासक सुधारदेव ने सन 1318 ईसवी में मन्दिर का पुनर्निर्माण कर यहाँ माँ दुर्गा की मूर्ति स्थापित की। यहाँ स्थित शिव व पार्वती की मूर्तियां उसी समय से यहाँ प्रतिस्थापित है।

दूनागिरि माता का भव्य मंदिर बांज, देवदार, अकेसिया और सुरई समेत विभिन्न प्रजाति के पेड़ों के झुरमुटों के मध्य स्थित है, जिससे यहां आकर मन को शांति की अनुभूति होती है। इस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की जीवनदायिनी जड़ी, बूटियां भी मिलती हैं |

दूनागिरी मंदिर के बारे में यह भी माना जाता है कि यहाँ जो भी महिला अखंड दीपक जलाकर संतान प्राप्ति के लिए पूजा करती है, उसे देवी वैष्णवी, संतान का सुख प्रदान करती है |

और यहाँ से हिमालय की विशाल पर्वत श्रंखला को यहाँ से देखा जा सकता है.
अब जानते हैं यहाँ कैसे पंहुचा जा सकता है!
द्वाराहाट और दुनागिरि पहुंचने के लिये निकटतम हवाई अड्डा 164किलोमटेर दूर पंतनगर में है। निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम 130 किलोमीटर की दूरी हैं, जहाँ से बस अथवा टैक्सी द्वारा यहाँ पंहुचा जा सकता हैं.
एक हवाई अड्डा चौखुटिया जो कि यहाँ से मात्र 25-30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित में प्रस्तावित हैं.

दुनागिरि से 14 किलोमीटर दूर द्वाराहाट और रानीखेत में रात्रि विश्राम लिए कई होटल्स उपलब्ध हैं, जिनकी जानकारी इंटरनेट में सर्च कर ली जा सकती हैं. अब आप कुछ प्रमुख स्थानों से दुनागिरि की दुरी स्क्रीन में देख रहें हैं और ये है यहाँ से निकटम रेलवे स्टेशन काठगोदाम से यहाँ पहुंचने के लिए रूट चार्ट




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इस विडीओ के आरम्भ में हमने जिक्र किया था – दुनागिरि के निकट ही स्थित है प्रसिद्द पाण्डुखोली आश्रम का, जहाँ लगभग ४ किलोमीटर का ट्रेक करके पंहुचा जा सकता हैं, पाण्डुखोली का शाब्दिक अर्थ है ‘पांडू’ जो पांडव और ‘खोली’ का आशय हैं – आश्रय स्थल अथवा घर,अर्थात ‘पांडवो का आश्रय.

पाण्डुखोली जाने का रमणीय मार्ग – बाज, बुरांश आदि के वृक्षों से घिरा है. कहते हैं पांडवो ने यहाँ अज्ञात वास के दौरान अपना कुछ समय व्यतीत किया था .
पाण्डुखोली आश्रम से लगा सुन्दर बुग्यालनुमा घास का मैदान, इसे भीम गद्दा नाम से जाना है, आश्रम के प्रवेश द्वार, से प्रवेश करते ही मन शांति और आध्यात्मिक वातावरण से प्रफुल्लित हो उठता है, आश्रम में रात्रि विश्राम के लिए आपको आश्रम के नियम आदि का पालन करना होता है, किसी प्रकार के नशे आदि का यहाँ कड़ा प्रतिबन्ध है

स्वामी योगानंद महाराज ने ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ योगी में बताया है कि उनके गुरु श्री युक्तेश्वर गिरि महाराज के गुरु श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय जी ने यहीं अपने गुरु महावतार बाबा जी से क्रिया योग की दीक्षा ली थी।

कहा जाता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास पांडवखोली के जंगलों में व्यतीत किये । यही नहीं पांडवों की तलाश में कौरव सेना भी पहुंची इस लिए इसे कौरवछीना भी कहा जाता था। लेकिन अब कुकुछीना के नाम से जाना जाता है।
माना जाता हैं – हमारे युग के सर्वकालिक महान गुरु – महावतार बाबा बीते पांच हजार साल से भी अधिक समय से यहां साधनारत हैं, उन्होंने दुनागिरि मंदिर में भी ध्यान किया था, उनका ध्यान स्थल दुनागिरि मंदिर भी देखा जा सकता हैं.

लाहिड़ी महाशय उच्च कोटि के साधक थे, पांडुखोली पहुंच गए, जहां महावतार बाबा ने उन्हें क्रिया योग की दीक्षा दी थी। लाहड़ी महाशय का रानीखेत और वहां से पाण्डुखोली पहुंचने और महावतार बाबा से साक्षात्कार का प्रसंग बेहद दिलचस्प हैं, जिसे आप ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ ए योगी जिसका हिंदी रूपांतरण – ‘योगी कथामृत’ में पढ़ सकते हैं, इन पुस्तकों का लिंक डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा. अगर आप इस प्रसंग को इस चैनल पर सुनना चाहेंगे तो कृपया कमेंट करके बतायेगा।




इस क्षेत्र की पहाड़ियों में अनेको – अनदेखी गुफाएं हैं, संतो को मनुष्यों की आवाजाही से, दूर शांत जगह ध्यान और समाधी के लिए पसंद होती हैं, यहाँ ‘भीम गद्दा कहे जाने वाले मैदान पर पर पैर मारने पर – खोखले बर्तन की भांति ध्वनि महसूस की जा सकती हैं.

यह जगह प्रसिद्ध है क्योंकि इस पहाड़ी में महामुनी बाबाजी महात्मा बलवंत गिरि जी महाराज की गुफा है। प्रत्येक दिसंबर माह में बाबा की पुण्यतिथि पर विशाल भंडारा होता है।

इस स्थान से आस पास की जगहों के आनेक लुभावने दृश्य देखे जा सकते हैं |

यही से कुमाऊँ की सबसे ऊँची non- himalaya चोटि भरतकोट जिसकी समुद्र तल से उचाई लगभग दस हजार फ़ीट है, स्थित है. ऐसा माना जाता है कि त्रेता युग में श्रीराम के अनुज भरत ने भी इस क्षेत्र में (भरतकोट या भटकोट) तपस्या की थी। कहा जाता है कि श्री राम के वनवाश के समय महात्मा भरत ने इसी स्थान पर तपस्या कि थी। रामायण के युद्ध के समय जब लक्ष्मण मेघनाथ के शक्ति प्रहार से मूर्छित हो गए थे तब वीरवार हनुमान उनके प्राणों कि रक्षा के लिए संजीवनी बुटी लेने हिमालय पर्वत गए।

जब वो वापिस रहे थे तो भरत को लगा के कोई राक्षस आक्रमण के लिए आकाश मार्ग से रहा है। उन्होंने ये अनुमान लगा कर हनुमान पर बाण चला दिया।




महावीर हनुमान मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े और मूर्छित अवश्था में भी राम नाम का समरण करने लगे। यह देख कर भरत को बहुत ग्लानि हुयी कि उन्होंने एक राम भक्त पर बाण चला दिया। भरत ने हमुमान जी से क्षमा याचना कि और उनसे पूरा वृतांत सुना।

गगास नदी जो सोमेश्वर में बहती है, उसका उद्गम स्थल भी यही है
ट्रैकिंग के शौक रखने वाले पर्यटक यहाँ भी विजिट करते हैं. जिसके लिए उन्हें अपने साथ जरुरी सामान – जिसमे हैं – फ़ूड, टेंट्स, गरम कपडे, रेनकोट, स्लीपिंग बैग मुख्य है,

भारतकोट या भटकोट के ट्रेक के लिए स्थानीय गाइड, अनुभवी अथवा प्रशिक्षित ट्रेकर के साथ ही जाना सही रहता हैं.

यह सफर यही तक, फिर आपसे मुलाकात होगी, धन्यवाद!
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देवता जागर उत्तराखंड लोक संस्कृति, मां भगवती, देवी

नैसर्गिक सुंदरता से भरे उत्तराखंड के अनेकों गांव – भले पर्यटन मानचित्र पर अंकित न हो, परन्तु इनकी सुरम्यता अद्भुत अविश्मरणीय हैं.

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में आपको एक खूबसूरत गांव – रैतोली लेकर चलते हैं और देखते हैं – यह पारंपरिक पूजा कैसे संपन्न की जाती हैं.

माँ नंदादेवी, माँ भगवती, सहित देवी के कई रूपों की पूजा उत्तराखंड में की जाती हैं, इसके लिए चैत्र विशेष रुप में पवित्र माना जाता हैं, यह समय उत्तराखंड में देवी की पूजा के रूप में अत्यंत हर्ष उल्लास और श्रद्धा से मनाया जाता है, इस पूजा में पारंपरिक तरीके से – देवता का आह्वान किया जाता हैं, इसके लिए समस्त बिरादरी के सदस्य सामूहिक रूप से पूजा में सम्मिलित होते हैं, पूजा की यह अवधि 3 दिन से लेकर आठ दिनों तक चलती हैं, जागर उत्तराखंड की पारंपरिक पूजा पद्धति हैं – जो गढ़वाल और कुमाऊँ में सदियों से मनाई जाती रही हैं,इसके द्वारा – देवताओं का आवाहन कर – उनसे अपनी समस्याओं के निवारण हेतु प्रश्न किये जाते हैं, और सबकी कुशलता और सम्पनता हेतु प्रार्थना की जाती हैं.




सर्वप्रथम ईश्वर को भोग चढ़ाने के लिए प्रसाद तैयार किया जाता हैं. श्री गोपाल दत्त पांडेय जी द्वारा समझते हैं – इस पूजा के बारे में.

जिनके शरीर में देवता अथवा देवी अवतार लेती हैं – उन्हें डंगरिये कहा जाता हैं. और देवताओं को जगाने की प्रक्रिया को जागर कहते हैं. देवताओं को जगाने के लिए प्रार्थना या आह्वान करने वाले जगरिये कहलाते हैं.

और जगरिये का साथ देने के जागर से पूर्व देवता को प्रसन्न करने के लिए झोड़ा गया जाता है, डंगरिये ढोल की ताल पर नृत्य करते हैं. अंतिम दिन हवन और भंडारा कर इस अनुष्ठान को संपन्न किया जाता हैं.




इस दौर में जब नयी पीढ़ी संयुक्त परिवार से दूर होने लगी हैं, जिससे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाने वाली हमारी संस्कृति, कला, परम्परा के बारे में जानकारी कम होती जा रही हैं, भले ही किसी का विश्वाश इन परम्पराओं में हो या नहीं लेकिन सच यह हैं की समय के साथ जब हमारे किरदार, पीढ़िया, तकनीक, सोच, आवश्यकताएं सब बदल जाती हैं, तब एक संस्कृति ही हैं, जो वर्षों से हमें – हमारी जड़ों से जोड़े रखी हैं, अतीत की सदियों पुरानी परम्पराओं को को नयी पीढ़ी तक लेकर जाती हैं.

उम्मीद हैं यह वीडियो अपने गांव – परिवार से दूर – नयी पीढ़ी को पुरानी परम्पराओं को समझने में सहयोग देगा.

धन्यवाद.

Shri Gopeshwar Mahadev Temple

Intro/ Preface
According to video ( as gopeshwar market, location etc)
History/ Story
Altitude, Weather, how to reach, distances, stay
Closing

Intro/ Preface
Popcorntrip mei aap ka ek baar fir se swagat hai, Popcorn Tirp me hamari koshish rahti hai.. Ki aap uttarakhand ko aur karib se jaane.

Hellow viwers, ये खबूसूरत और शांत जगह है गोपेश्वर। और ye आप देख रहें है यहाँ की बाजार और बस व टैक्सी स्टैंड. रविवार को यहाँ बाजार का साप्ताहिक अवकाश रहता है। अभी अभी यहाँ बारिश हुई है जिससे मौसम सुहावना हो गया है। पहाड़ियों में बिखर रहा रहा कोहरा इसे और भी खुशनुमा बना रहा है।




Ye सामने प्रवेश द्वार है श्री गोपेश्वर महादेव मंदिर का, जिसकी दुरी यहाँ से करीब ½ kilometer ke karib है, Taxi stand से लगभग ५०० मीटर पैदल चल कर गोपीनाथ मंदिर तक आसानी से, पंहुचा जा सकता है।
इस लेख में आप जानेंगे उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में चमोली जिले में गोपेश्वर में स्थित श्री गोपीनाथ मंदिर से जुडी बातों को।

गोपीनाथ मंदिर एक प्रसिद्द धार्मिक स्थल उत्तराखंड ये मंदिर भगवन शिव को समर्पित है। प्रतिवर्ष बड़ी संख्यां में यहाँ आकर इस धार्मिक sthal के darshan कर पुण्य प्राप्त करते हैं।




मान्यता है कि – भगवान शिव को समर्पित यह कत्यूरी शासन काल में 9 वीं se 11 वीं शताब्दी के बीच बनाया गया था। गोपीनाथ मंदिर की बनावट उत्तराखंड के अन्य शिव mandiron जैसे केदारनाथ जी और तुंगनाथ से मिलती है।
मन्दिर के आस पास , माँ दुर्गा , श्री गणेश एवं श्री हनुमान जी के मन्दिर हैं।
इस मन्दिर में शिवलिंग, परशुराम, भैरव जी की प्रतिमाएँ विराजमान हैं। मंदिर के गर्भ गृह में शिवलिंग स्थापित है।

बद्रीनाथ -केदारनाथ मार्ग में, चमोली जिला मुख्यालय से 10 किलोमीटर दूर गोपेश्वर है। और गोपेश्वर उत्तराखंड के अन्य shaharon जैसे ऋषिकेश, देहरादून, हरिद्वार, कर्णप्रयाग aadi से achhi तरह कनेक्टेड है। नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश २२० किलोमीटर , नजदीकी एयरपोर्ट देहरादून जॉली ग्रांट २५८ किलोमीटर की duri पैर स्थित है।

अब हम पहुंच चुकें हैं मंदिर के समीप, ये यहाँ लगे बोर्ड पर मंदिर के बारे में संछिप्त जानकारी, जैसे यहाँ से अन्य आस पास के प्रमुख स्थानों से यहाँ की दुरी, इस स्थान का संछिप्त परिचय।

यहाँ लगे कुछ शिलापटों में आप यहाँ का संछिप्त विवरण पढ़ सकते हैं।




मंदिर के पीछे कुछ दिलचस्प से लगने वाले पारम्परिक तरीकों से बने लकड़ी, मिटटी और पत्थरों से बने घर।
इन मकानों की खासियत ये होती है, के इनके अंदर गर्मियों में ठंडा और जाड़ों के मौसम में गरम होता है।
छतों में इनके चपटे और बड़े आकर की पत्थरों जिन्हे स्थानीय बोली में पाथर कहते हैं लगे होते हैं, उसके नीचे लकड़ी लगी होती है।

History/ Story

इस मंदिर की स्थापना को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।

एक मान्यता के अनुसार देवी सती के शरीर त्यागने के बाद भगवान शिव जी इसी स्थान में तपस्या में लीन हो गए थे।
और तब “ताड़कासुर” नामक राक्षस ने तीनों लोकों में हा-हा-कार मचा रखा था और उसे कोई भी हरा नहीं पा रहा था।

तब ब्रह्मदेव ने देवताओं से कहा कि भगवान शिव का पुत्र ही ताड़कासुर को मार सकता है। उसके बाद से सभी देवो ने भगवान शिव की आराधना करना आरम्भ कर दिया लेकिन तब भी शिवजी तपस्या से नहीं जागे। फिर भगवान शिव की तपस्या को समाप्त करने के लिए इंद्रदेव ने यह कार्य कामदेव को सौपा ताकि शिवजी की तपस्या समाप्त हो जाए और उनका विवाह देवी पारवती से हो जाए। और उनका पुत्र राक्षस “ताड़कासुर” का वध कर सके।
जब कामदेव ने अपने काम तीरो से शिवजी पर प्रहार किया तो भगवान शिव की तपस्या भंग हो गयी। तथा जब शिवजी ने क्रोध में जब कामदेव को मारने के लिए अपना त्रिशूल फैका , तो वो त्रिशूल इसी स्थान में गढ़ गया था ।
यह भी कहा जाता है कि मंदिर के आसपास टूटी हुई मूर्तियों के अवशेष इस बात का संकेत करते हैं कि प्राचीन समय में यहाँ अन्य भी बहुत से मंदिर थे। मंदिर के आंगन में एक ५ मीटर ऊँचा त्रिशूल है, जो १२ वीं शताब्दी का है और अष्ट धातु का बना है।
दन्तकथा है कि जब भगवान शिव ने कामदेव को मारने के लिए अपना त्रिशूल फेंका तो वह यहाँ गढ़ गया। त्रिशूल की धातु अभी भी सही स्थित में है जिस पर मौसम प्रभावहीन है और यह एक आश्वर्य है। यह माना जाता है कि शारिरिक बल से इस त्रिशुल को हिलाया भी नहीं जा सकता, जबकि यदि कोई सच्चा भक्त इसे छू भी ले तो इसमें कम्पन होने लगता है।
गोपीनाथ मंदिर , केदारनाथ मंदिर के बाद सबसे प्राचीन मंदिरों की श्रेणी में आता है। मंदिर के चारों ओर टूटी हुई मूर्तियों के अवशेष प्राचीन काल में कई मंदिरों के अस्तित्व की गवाही देते हैं। मंदिर के आंगन में एक त्रिशूल है, जो लगभग 5 मीटर ऊंची है, जो आठ अलग-अलग धातुओं से बना है, जो कि 12 वीं शताब्दी तक है।

इस मदिर से जुडी एक अन्य खास बात ये हैं कि यहीं भगवान श्री केदारनाथ जी के अग्रभाग रुद्रनाथ जी की गद्दी शीतकाल में छह माह के लाई जाती है जहां पर शीतकाल के दौरान रुद्रनाथ की पूजा होती है।
भगवान केदारनाथ जी के मुखभाग रुद्रनाथ जी के मंदिर में प्रतिदिन भव्य पूजा की जाती है |




हर रोज सैकडो़ श्रद्धालू यहां भगवान के दर्शन करने के लिए आते हैं। इस मंदिर में शिवलिंग ही नहीं बल्कि परशुराम और भैरव जी की प्रतिमाएं भी स्थापित है। मंदिर के गर्भ गृह में शिवलिंग स्थापित है और मंदिर से कुछ ही दूरी पर वैतरणी नामक कुंड भी बना हुआ है, जिसके पवित्र जल में स्नान करने का विशेष महत्व है।
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1 of the 7 wonders of the world Tajmahal

ऊपर वाले की बनायीं – सारी दुनिया ही अपने आप में आश्चर्य है, और आश्चर्यों से भरी इस दुनिया में हर रोज कई बातें हमे चौंकाती हैं।
मानव द्वारा समय समय पर कुछ ऐसे innovations और creation होते रहें हैं, जो दुनिया के लिए मिसाल बनकर स्वर्णिम इबारतों में दर्ज हो इतिहास बना देते हैं।

ऐसी ही एक मिसाल हमारे देश में हैं – ताजमहल, दुनिया के सात अजूबों में से एक, जो देश की सबसे ज्यादा जनसँख्या वाले – राज्य उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में है। जहाँ प्रतिदिन हजारों पर्यटक इस भव्य कृति को देखने यहाँ आते हैं।

Entry, Reservation & Timings, Documents required
ताजमहल विजिट के लिए टिकट लेना होता हैं, ticket आप काउंटर से लेने के अलावा ऑनलाइन भी बुक कर सकते हैं। इसके लिए लिंक आप को इस वीडियो के डिस्क्रिप्शन में मिल जायेगा।




सूर्योदय होने से 1 घंटे पूर्व से लेकर सूर्यास्त के 45 मिनट पूर्व तक visitors टिकेट खरीद सकते हैं।
ताजमहल में पूर्वी और पश्चिमी गेट द्वारा प्रवेश किया जा सकता है और exit के लिए तीन गेट हैं पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी द्वार।

Timings: 6:00 AM to 7:30 PM (Taj Mahal remains closed on Friday)
https://asi.payumoney.com/#/
इस लिंक से न सिर्फ ताज बल्कि देश में दूसरी जगहों के भी हेरिटेज monuments के टिकट्स भी बुक किये जा सकते हैं।

फिजिकली disabled यानी दिव्यांगो के लिए व्हील चेयर और फर्स्ट एड बॉक्स एएसआई कार्यालय में उपलब्ध हैं। जिसका संपर्क no. : 0562 – 2330498।
गेट पर ताजमहल का मैप देखा जा सकता हैं. ताज center me, बायीं और मस्जिद, दायी और म्यूजियम और ताजमहल के पीछे यमुना नदी बहती हैं।

ताजमहल के सामने बने विशाल गेट से – प्रवेश कर – सामने सफ़ेद इमारत देखते ही आप दुनिया के उन कुछ लोगो में शुमार हो जाते हैं – जिन्होंने बेमिसाल ताज का दीदार किया है।

ताजमहल देश में सबसे ज्यादा विजिट किये जाने वाले destinations में से एक हैं। ताजमहल में वर्तमान को अतीत से जुड़ता हुआ महसूस किया जा सकता है।

सफ़ेद संगमरमर से बना मकबरा, जिसके आगे खूबसूरत garden, फाउंटेन, तालाब में ताज का रिफ्लेक्शन, ताजमहल के मेहराब और उन पर उभरी नायाब नक्काशी देख, नज़रे सम्मोहित हो इसकी खूबसूरती बिना पलक झपकाए निहारती हैं।




ताज विजिट करना अपने आप में एक विशिष्ट अनुभव है, जहाँ एक तरफ इसकी खूबसूरती लाजवाब है, वही दूसरी ओर उत्कृष्ट शिल्प कौशल के साथ, दीवारों पर की गयी नक्काशी, और सुन्दर कैलीग्राफी अद्भुत है।
ताजमहल का शिल्प, दीवारों पर नक्काशी और इसकी बेजोड़ खूबसूरती – हमेशा के लिए स्मृतियों में जगह बना लेती है।

ताज महल के सामने बने चबूतरे और गार्डन में और इसके आसपास – पर्यटक तस्वीरें खीचातें हैं।
ताजमहल के दाहिनी हाथ को है shoe stand, जहाँ visitor बिना किसी चार्ज diye अपने footware संभाल सकते हैं। या फिर आपको शू कवर खरीदने होते हैं जो yahan लगभग २० – ३० रुपये में मिल जाते हैं।

History, Architect

ताजमहल को बनाने में तक़रीबन 20 हजार मजदूरों, शिल्पकारों का योगदान है, और इसे बनने में लगने वाला समय
लगभग 20 वर्ष।
ताजमहल को मुगल वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण माना जाता है। एक ऐसी शैली जो फारसी, भारतीय और इस्लामी वास्तुशिल्प बनावट के तत्वों को आपस में जोड़ती है।
San 1631 में शुरू हो – 1648 में यह मकबरा तैयार हुआ, सफेद संगमरमर की बानी यह ईमारत – ताजमहल “मुगल साम्राज्य के समय, बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल के स्मारक के रूप में बनवायी थी।




ताजमहल की छत फ्लावर पैटर्न और फर्श geomatrical डिजाइन के साथ सजाया गया है।
मुख्य संरचना का भीतरी भाग लाखौरी मिट्टी के ईंटों से बना है, जिसे खूबसूरती से संगमरमर से ढका गया है, जबकि आसपास के ढांचे लाल बलुआ पत्थर से ढके हुए हैं।

ताजमहल 1983 में, यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल बन गया, और इसे ” पर्शियन, भारतीय और इस्लामी कला शैली में निर्मित किया गया हैं, कला के इस खूबसूरत नगीने को, विश्व की धरोहर के रूप में univarsally admired (शीर्ष उत्कृष्ट रचना)/ मास्टरपीस के रुप में मान्यता मिली हैं”

मकराना के सफेद संगमरमर से बना, दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक- ताजमहल – दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करता है।

ताजमहल के लिए जहाँ से visitors प्रवेश करते हैं – दरसअल वो पिछला द्वार हैं – ताजमहल का मुखय द्वार यमुना नदी की और उत्तरी छोर पर हैं.

ताज के बनने के 370 से ज्यादा वर्ष बीत गए, लेकिन आज भी संगमरमर से बनी अद्भुत धरोहर यमुना नदी के किनारे, अपने अतुलनीय और अद्भुत सौंदर्य से न सिर्फ सैलानियों को लुभाती रही – बल्कि वास्तुशिल्प और वैज्ञानिक अनुसंधान को निरंतर प्रेरणा दे रही हैं.
युनेस्को की वर्ल्ड हैरिटेज कीपूर्व अमेरिकन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कहा था कि “आज मुझे अहसास हुआ कि इस दुनिया में दो तरह के लोग हैं. एक वो जिन्होंने ताज देखा है और दूसरे वो जिन्होंने ताज नहीं देखा.”।



ताजमहल आने का समय व दिन

ताजमहल विजिट करने से पूर्व ध्यान रखे – अक्टूबर से मार्च के बीच यहाँ टूरिस्ट्स का पीक सीजन होता हैं, – इस समय कभी badi sankhya me पर्यटक ताजमहल देखने आते हैं।

ताजमहल विज़िटर्स के लिए शुक्रवार को बंद रहता है और इस दिन दोपहर को केवल उन लोगों के लिए खोला जाता है, जिन्हें ताजमहल के बायीं ओर बनी मस्जिद में नमाज अदा करनी हो।
ताजमहल सूर्योदय से 30 मिनट पहले और सामान्य दिनों के दौरान सूर्यास्त से 30 मिनट तक खुला रहता है।

आगरा समुद्र तल से 171 मीटरस की हाइट पर हैं, यहाँ विजिट करने का बेस्ट सीजन अक्टूबर से मार्च माना जाता हैं. लेकिन पुरे साल में कभी भी यहाँ आया जा सकता हैं, अप्रैल से जून तक गर्मियों के कारण, और जुलाई से सितम्बर तक बरसात की वजह से पर्यटकों की आवाजाही थोड़ा कम रहती हैं।

ताजमहल सामान्तया सुबह छह बजे से शाम साढ़े छह बजे तक खुला रहता है।
ताजमहल महीने में पांच दिन रात के समय भी खुलता है।
पूर्णिमा के रात्रि यानी जब चाँद अपने पुरे आकार में होता है… शाम 8:30 se 12:30 midngiht तक, पूर्णिमा की रात और उससे पहले की और बाद के दो रातो तक . फ्राइडे को छोड़कर।




रात में विजिट सीमित लोगो के लिए रहता हैं, और को 30 मिनट का समय मिलता है। चांदनी रात में ताज को निहारने को. जिसके लिए काम से काम 24 घंटे पहले टिकट्स लेनी होती हैं। अलग अलग समय पर बदलती रौशनी के हिसाब से ताज के अलग-अलग शेड्स दिखाई देते हैं, प्रेम का प्रतीक ताजमहल – चांदनी रात में – बेहद ही आकर्षक दिखाई देता हैं।

Do’s & Dont’s
आप ताजमहल विजिट करते हुए अपने साथ कम से कम 1 लीटर पानी के बोतल अवश्य रख लें, हालाकिं यहाँ पर RO वाटर की व्यवस्था है।
साफ़ सफाई व शांति व्यस्वस्था का ध्यान रखें।
गाइड आदि hire करने से पहले उनके फोटो पहचान पत्र जाच लें।
ताजमहल परिसर के अन्दर khadhya samgri laane, धुम्रपान, तंबाकू उत्पाद, शराब, गोला बारूद, किसी भी तरह के शस्त्र, tripod l बिजली के सामान (कैमरे को छोड़कर), लेन की शख्त मनाही है।
मोबाइल फ़ोन को साइलेंट मोड़ में रखें।
स्मारक के अंदर बड़े बैग और किताबें ले जाने से बचें, इससे आपका सुरक्षा जांच mei lagne waala समय बढ़ सकता है।
मुख्य मकबरे के अंदर फोटोग्राफी निषिद्ध है।
500 मीटर के भीतर कोई प्रदूषण वाहनों की अनुमति नहीं है।
दीवारों और स्मारकों की सतहों को छूने और खरोंच से बचें क्योंकि ये विरासत स्थल हैं और इन्हे विशेष देखभाल की आवश्यकता है।

How to Reach
आगरा देश के सभी प्रमुख हिस्सों से सड़क, रेल और हवाई मार्गो द्वारा वेल कनेक्टेड है।
by air
Indian Airlines की भी नियमित उड़ाने आगरा के लिये उपलब्ध हैं।



by rail
रेल मार्ग द्वारा आगरा अच्छी तरह कनेक्ट है. आगरा cantoment के मुख्य रेलवे स्टेशन के अलावा दो अन्य रेलवे स्टेशन राजा की मंडी और आगरा फोर्ट रेलवे स्टेश में मौजूद हैं। दिल्ली से आगरा को आने वाली मुख्य ट्रेन्स Palace on Wheels, Shatabdi, Rajdhani और Taj Express है।

by road
आगरा के लिए देश के कई शहरों में नियमित बस सेवाएं हैं। दिल्ली, जयपुर, मथुरा, आदि से आप आसानी से बस या टैक्सी द्वारा आगरा पहुँचा जा सकता है।
आगरा की दूरी – दिल्ली से ताज एक्सप्रेस/ यमुना एक्सप्रेस वे से 233 किलोमीटर।
जयपुर से 240 किलोमीटर हैं।
लखनऊ से 333 किलोमीटर।
देहरादून से 433 किलोमीटर और हल्द्वानी से NH 509 से होते हुए 331 किलोमीटर की दुरी पर है।
कुछ अन्य स्थानों से आप दुरी स्क्रीन में देख सकते हैं
Bharatpur – 57 km
Delhi – 204 km
Gwaior – 119 km
Jaipur – 232 km
Kanpur – 296 km
Khajuraho – 400 km
Lucknow – 369 km
Mathura – 56 km
Varanasi – 605 km

शहर में पहुंचने के बाद, आपको ताजमहल पहुंचने के लिए आसानी से टैक्सी, टेम्पो, ऑटो-रिक्शा और साइकिल रिक्शा उपलब्ध हो जाते हैं। यदि आप शहर के पास विभिन्न स्थानों पर जाना चाहते हैं तो प्रीपेड टैक्सी भी उपलब्ध हैं। इसके अलावा प्रति घंटे के किराये के हिसाब से साइकल्स भी उपलब्ध हो जाती हैं । चूंकि ताजमहल क्षेत्र के आसपास डीजल और पेट्रोल वाहन की अनुमति नहीं है, इसलिए आप बैटरी संचालित बसों, रिक्शा और अन्य प्रदूषण मुक्त वाहनों को hire सकते हैं।




Where to stay

आगरा में रुकने के लिए हर बजट के होटल्स अवेलेबल हैं, जिन्हे आप इंटरनेट पर आसानी से सर्च कर सकते हैं। कई मोबाइल aps अथवा वेबसाइटस द्वारा, बिना एडवांस पेमेंट किये भी होटल रूम्स की बुकिंग की जा सकती है।

Get in touch by Email or Call on the address given below to Find a Government approved tour guide in Taj Mahal, Agra.
U.P. Tourism office
64, Taj Road, Agra – 282001
Tel. : (+91) 562 – 2226431

Indian Tourism Office
191, Mall Road, Agra – 282001
Tel : (+91) 562 – 2226378

आगरा में घूमने के लिए अन्य आकर्षण हैं
Agra Fort
Open : Sunrise to sunset. | Distance about: 4.7 Kms from Agra Cantt Railway Station. | Entry fee : Domestic Tourist : 40/- Foreign Tourist : 550/-
Also known as Lal Qila, Fort Rouge or Red Fort of Agra, the Agra Fort is a UNESCO world heritage site. It is situated at a distance of about 2.5km northwest of the famous Taj Mahal.

Fatehpur Sikri
Open: Sunrise to sunset.
Distance about : 39kms from Agra City.
Entry fee : Domestic Tourist : 40/- Foreign Tourist : 510/-
Akbar का मकबरा
Mariam का मकबरा
एतमादुद दौला का मकबरा
Ram Bagh
Mehtab Bagh

जहाँ के लिए आप कैब कर सक ते हैं, आगरा आये हैं तो यहाँ का पेठा खाना न भूले, देश के कई भागों में पेठा बनता हैं- लेकिन दुनिया में सबसे मशहूर पेठे आगरा में बनते हैं जो कितनी ही वैरायटी में आते हैं.
ताज के दायी ओर म्यूजियम हैं, फिलहाल तो यह लगभग खाली था।
ओर बायीं ओर हैं – मस्जिद, जहाँ हर फ्राइडे नमाज़ होती हैं.
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