Travel story
लाहिड़ी महाशय Ranikhet में महावतार बाबाजी से मुलाकात


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admin · 2020-03-28
https://youtu.be/5W3R1MeIu9Y
आज के वीडियो में हैं पॉपकॉर्न ट्रिप चैनल में अब तक की सबसे विशिष्ट यात्रा का वर्णन, - यह यात्रा आज से लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व की गयी थी - महान संत लाहड़ी महाशय द्वारा - Uttarakhand में अल्मोड़ा जिले में Ranikhet, दुनागिरी की पहाड़ियों की।
दानापुर में सेना में अकाउंटेंट के पद पर कार्यरत थे। 1869 में उन्हें सुचना मिली कि - उनका स्थानांतरण Ranikhet में हो गया. - जहाँ सेना का नया कैंप स्थापित किया जा रहा था।
एक सेवक के साथ, घोड़े और बग्घी से यात्रा करते हुए दानापुर से Ranikhet तक लगभग 500 मील की दुरी तय करने में 30 दिन का समय लगा।
एक दोपहर Ranikhet की पहाड़ियों में सैर करते हुए उनको उन्हें लगा - जैसे कोई उनका नाम लेकर पुकार रहा हैं। कौतूहलवश वो आवाज की दिशा में द्रोणागिरी पर्वत की और बढ़ते रहे। इस बात से भी चिंतित थे किं कहीं उन्हें लौटने से पहले अँधेरा न हो जाए।
चलते हुए वो एक खुली जगह पर पहुंचे - जिसके दोनों और गुफा थी। वहां अपनी तरह दिखने वाले एक युवक के को उनके स्वागत में खड़े देख - वो आश्चर्य में पड़ गए। युवक ने बताया कि - उन्होंने ही लाहिड़ी महाशय को पुकारा था। स्वागत में खड़े युवा संत - परम सिद्ध महावतार बाबा थे। जिनके बारें में कहा जाता हैं, वो आज भी जीवित हैं और एक जगह ज्यादा देर नहीं रहते, कई पवित्र और सिद्ध महापुरुषों को आज उनके दर्शन का सौभाग्य मिलत्ता रहता हैं।
लाहड़ी महाशय को उन्होंने एक गुफा में विश्राम करने को कहा। -
लाहड़ी तुम्हे वो आसान याद हैं? महावतार बाबा ने कोने पर परे कम्बल की और इशारा करते हुए कहा।
नहीं महाराज, - लाहड़ी महाशय अपनी इस विचित्र साहसिक यात्रा पर[ हतप्रभ हो बोले।
महाराज - मुझे अँधेरा होने से पहले निकलना होगा - सुबह ऑफिस में काम हैं।
लाहिड़ी महाशय के लिए उस समय तक रहस्मय संत ने अंग्रेजी में उत्तर दिया - The office is brought for you, and not you for the office (ऑफिस तुम्हारे लिए लाया गया हैं, तुम ऑफिस के लिए नहीं)
निर्जन वन में एक सन्यासी से ऐसे शब्द सुन लाहिड़ी महाशय आवक रह गए ।
संत ने आगे बताया कि लाहिड़ी महाशय के Ranikhet स्थानांतरण के लिए - उन्होंने ही सेना के अधिकारी के मन को को ही गुप्त रूप से, यहाँ कैंप लाने और उनके स्थानांतरण का सुझाव दिया था।
संत ने कहा कि यह जगह - उन्हें परिचित लग रही होगी कर इसके बाद - लाहिड़ी महाशय के माथे को स्पर्श किया, तो उनकी पूर्व जन्म की सम्र्तियाँ जाग गयी ।
उन्हें याद आया कि ये संत उनके पूर्व जन्म के गुरु - महावतार बाबा हैं। उन्हें याद आया किं पूर्व जन्म में इसी गुफा में - उन्होंने कई वर्ष बिताये थे। पूर्व जन्म की मधुर और पवित्र स्मृतियों से वो भाव विव्हल हो उठे।
उस रात लाहड़ी महाशय के पूर्व जन्म के कर्मों के बंधन से मुक्ति के लिए महावतार बाबा ने उस जंगल में अपनी योग शक्ति से एक सवर्णों और रत्नो से प्रकाशित महल एक निर्माण कराया, जो लाहिड़ी महाशय के पूर्व जन्म में जगी इच्छा थी। हिन्दू मान्यता हैं - किं - जब तक मनुष्य में कामना और इच्छा शेष हैं - उसका जन्म होता रहेगा, पूर्व जन्म की अधूरी इच्छा - उसके अगले जन्म में उसके अवचेतन मन के अंदर रहती हैं। लाहिड़ी महाशय का स्वर्ण महल से मोह भग हो जाने पर वह महल अदृश्य गया। दिव्य पुरुषों के लिए किसी भी वस्तु की कल्पना और उसकी शृष्टि में में कोई अंतर नहीं होता।
पूर्व जन्म के की अनुभूतियों का बोध, महावतार बाबा से प्राप्त ज्ञान और उनकी कृपा से अगले सात दिन लाहिड़ी महाशय निर्विकल्प समाधि में लींन रहे।
आत्म ज्ञान के अनेकों स्तरोँ को पार कर आठवे दिवस - लाहिड़ी महाशय ने उसी वन में बाबाजी के साथ हमेशा के लिए रहने की इच्छा प्रकट की।
बाबाजी ने उन्हें बताया - कि उनके इस जन्म का उद्देश्य सामान्य मानवों के बीच रहकर अपनी भूमिका निभानी हैं। उनका इस बात के पीछे गहरा उद्देश्य था कि लाहिड़ी महाशय को गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के बाद ही बाबाजी से मिल पाए।
गृहस्थ योगी के रुप में उन्हें - संसारी लोगो के मध्य रह उन्हें सांत्वना देनी होगी कि - गृहस्थ भी ब्रह्म की उपलब्धि कर सकते हैं।
जिससे पारिवारिक बंधन में बंधे, सांसारिक कर्तव्यों से दबे, अनेकों लोगो को - बिना सांसारिक बंधन तोड़े - ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए हिम्मत और प्रेरणा मिलेगी।
महावतार बाबा ने उन्हें यह भी वचन दिया कि जब भी लाहिड़ी महाशय आव्हान करेंगे - बाबाजी उनके आगे प्रकट हो जायेगे। बाद में कई अवसरों में बाबाजी उन्हें दर्शन देते रहे हैं।
उन्होंने भगवतगीता के इस अमर वचन को अपने सभी शिष्यों को बताने को कहा।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात - अर्थात - इस धर्म का थोड़ी सी भी साधना बड़े से बड़े भय से रक्षा करता हैं।
बाबाजी के आदेश से लाहिड़ी महाशय द्वाराहाट के द्रोणागिरी की पहड़ियों से नीचे उतरे, द्वाराहाट के निकट वर्तमान में योगदा सोसाइटी द्वारा स्थापित आश्रम भी हैं, जिसमे प्रतिवर्ष अनेकों श्रदालु और अनुयायी इस पुण्यभूमि के दर्शन के आकर धन्य होते हैं।
लाहड़ी महाशय 10 दिन के बाद जब अपने कार्यालय पहुंचे तो उनके सहयोगी प्रसन्न हो उठे, उन्हें लगा था, कि लाहड़ी महाशय हिमालय के इन जंगलो में खो गए हैं। इसके शीघ्र बाद - मुख्यालय से एक पत्र आया जिसमे लिखा था -
लाहिड़ी को वापस दानापुर लौट जाना चाहिए, उनका Ranikhet स्थानांतरण गलती से हुआ। लाहिड़ी महाशय का Ranikhet आने का उद्देश्य पूर्ण हुआ।
लाहिड़ी महाशय और महावतार बाबा के महान जीवन के बारे में बारे में अधिक जानने की जिज्ञासा हो तो उनसे जुडी पुस्तके पढ़ सकते हैं।
https://youtu.be/5W3R1MeIu9Y
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