Haldwani to Nainital Journey

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हल्द्वानी से नैनीताल की दुरी 40 किल्मोटर और सफ़र तय करने में लगने वाला समय लगभग डेढ़ से 2 घंटे… क्यूंकि यहाँ से लगभग 7 किलोमीटर की दुर रानीबाग के बाद, घुमावदार और हलकी चढाई शुरू हो जाती है।

पहाड़ी क्षेत्र होने से बस संचालक रात्रि में बस सेवा अमूमन नहीं चलते…. और अगर आपको देर दुपहरी या शाम को यात्रा करनी है तो तिकोनिया टैक्सी स्टैंड से टैक्सी आदि hire करनी होंगी… कभी कभी शेयर्ड टैक्सी भी आपको मिल जाती हैं, और बरेली, रुद्रपुर जैसे स्थानों के लिए आपको नियमित अन्तराल पर रोडवेज बस स्टेशन से बस मिल जायेंगी (ये क्यों? नैनीताल जा रहे है, आउट ऑफ़ थे कॉन्टेक्स्ट)।

अधिक जानने के लिए देखें वीडियो ।





To know about hotels/ Resort in Nainital District, visit the website : www.nainitalOnline.com

उत्तराखंड के विभिन्न पर्यटक स्थलों और यात्राओं से जुडी की जानकारी। और ये जानकारी आपको सहायता करेगी इन स्थानों में जाने से पहले क्या तैयारियां की जाएँ, कैसे पंहुचा जाए, और वहां के मुख्य आकर्षण। इसलिए अलग अलग स्थानों से जुडी रोचक जानकारियों से अपडेट रहने हेतु हो सके तो PopcornTrip youtube चैनल subscribe करें।

Reetha Sahib Gurudwara Vlog

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सिक्खों और हिन्दुओं की धार्मिक आस्था का केंद्र, श्री रीठा साहिब, उत्तराखण्ड के चम्पावत जिले में जिला मुख्यालय से लगभग 72 कि.मी. की दुरी पर ड्युरी नामक एक छोटे से गांव में लोदिया और रतिया नदी के संगम पर स्थित है । गुरुद्वारा श्री हेमकुंड साहिब उत्तराखंड के चमोली जिले में है। यह गुरुद्वारा समुद्र स्तर से 4000 मीटर की ऊंचाई पर है। बर्फबारी के कारण यात्रियों की सुरक्षा के लिए इसे अक्टूबर से अप्रैल तक बंद कर दिया जाता है। नानकमत्ता गुरुद्वारा से श्री रीठा साहिब पहुचने का मार्ग खटीमा, टनकपुर, चम्पावत, लोहाघाट, धुनाघाट से होते हुए आता है ।

चीड के जंगलों से घिरा हुआ और साथ के हरे भरे उपजाऊ भूमि और नदी से लगा हुआ रीठा साहिब गुरुद्वारा आईये चलते हैं गुरुद्वारा दर्शन को… ये रीठा साहिब बाजार, यहाँ डेली नीड्स की जरूरतों आदि के दुकाने और एक बैंक पंजाब & सिंध बैंक की एक शाखा है. और बाजार से आगे बद हम बद रहें है गुरद्वारे की ओर , यहाँ पर मार्ग संकरा होने की साथ साथ काफी तेज ढलान वाला भी है… ये देखिये सामने रस्ते में ढलान की साथ साथ मोड़ भी है, यहाँ पर काफी धीमी गति में और सावधानी पूर्वक अपना वाहन चल्यें … और अब हम पहुचे हैं गुरूद्वारे के एंट्रेंस पर, एंट्रेंस से लगा हुआ ही पार्किंग स्पेस है… , पार्किंग से लगा हुआ ही रिसेप्शन हैं… यहाँ आपने रुकना हो तो यहाँ आपको एंट्री करनी होती है और पहचान सम्बन्धी डाक्यूमेंट्स जैसे DL, वोटर id कार्ड, aadhar, आदि दिखाने होते हैं, यहाँ आपको काफी रियायती दरो में कमरे अलग अलग श्रेणी जैसे dormatory, डबल एंड फोर beded फॅमिली room आदि . ३००, ५००, ८०० आदि के कीमत में उपलब्ध हैं. …. ये रिसेप्शन से बाहर से दिखने वाला दृश्य जहाँ राईट हैण्ड को रुकने के लिए कमरे, सामने मुख्य गुरूद्वारे के लिए प्रवेश द्वार, और बाये रसोई घर और dining एरिया है … और ये सामने दिख रहा पार्किंग एरिया… चारो और पहाड़ियों के बीचो बीच बसे इस स्थान में पीछे चलती गुरुबानी की मधुर आवाज और मधुर संगीत की आवाज सुन आपको अलग ही आनंद और शांति की प्राप्ति होती है..;.

इस गुरुद्वारे का निर्माण 1960 में करवाया गया था । गुरूद्वारा रीठा साहिब उत्तराखण्ड राज्य के समुद्री तल से लगभग 7,000 फुट की ऊच्चाई पर स्थित है | इस स्थान के बारे में यह कहा जाता है कि गुरु नानक जी ने इस जगह का दौरा किया था यह जगह एक खास तरह के मीठे रीठा के पेड़ों के लिए भी प्रसिद्ध है । यहां तीर्थयात्रियों के आवास, भोजन आदि सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इस तीर्थ स्थल में तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए करीब दो सौ कमरे और सराय हॉल है। हरसाल लाखों लोग गुरुनानक की आध्यात्मिक शक्ति के चमत्कार को नमस्कार करने आते हैं।

गुरद्वारे में जाने के लिए आपको अपने जुते चप्पल उतार कर अपने पेरो को रस्ते में बने कुंड में डूबा कर धोना होता है… जिससे आपके पेरो के द्वारा कोई गन्दगी गुरुदारे में ना जाए, साथ ही अपने सर को ढकना भी होता है ।

एक रीठा का वृक्ष (मूल नहीं है) अभी भी यहां है और तीर्थयात्रियों को मिठाई में रीठे का रस का प्रसाद दिया जाता है । गुरुद्वारा से लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर, एक ऐसा बगीचा है जहां ऐसे पेड़ उगते हैं और उनके फल एकत्र किए जाते हैं और उन्हें गुरुद्वारा के प्रसाद का भंडार भरने के लिए लाया जाता है। इसे नानक बागीच कहा जाता है।

इस स्थान के बारे में यह मान्यता है कि सन् 1501 में सिख धर्म के संस्थापक श्री गुरु नानक देव (1469-1539) अपने शिष्य “बाला” और “मरदाना” के साथ रीठा साहिब आए थे | इस दौरान गुरु नानक देव जी की उनकी मुलाकात सिद्ध मंडली के महंत “गुरु गोरखनाथ” के चेले “ढ़ेरनाथ” के साथ हुई| इस मुलाकत के बाद दोनों सिद्ध प्राप्त गुरु “गुरु नानक” और “ढ़ेरनाथ बाबा” आपस में संवाद कर रहे थे | दोनों गुरुओं के इस संवाद के दौरान मरदाना को भूख लगी और उन्होंने गुरु नानक से भूख मिटाने के लिए कुछ मांगा | तभी गुरु नानक देव जी ने पास में खड़े रीठा के पेड़ से फल तोड़ कर खाने को कहा, लेकिन रीठा का फल आम तौर पर स्वाद में कड़वा होता हैं, लेकिन जो रीठा का फल गुरु नानक देव जी ने भाई मरदाना जी को खाने के लिए दिया था वो कड़वा “रीठा फल” गुरु नानक की दिव्यता से मीठा हो गया | जिसके बाद इस धार्मिक स्थल का नाम इस फल के कारण “रीठा साहिब” पड़ गया|

साथ ही रीठा साहिब गुरुद्वारे की यह मान्यता है कि रीठा साहिब में मत्था टेकने के बाद श्रद्धालु ढ़ेरनाथ के दर्शन कर अपनी इस धार्मिक यात्रा को सफल बनाते है | आज भी यहाँ होने वाला रीठा का फल खाने में मीठा होता है और और गुरूद्वारे द्वारा इन्ही मीठे रीठो का प्रसाद श्रध्हलुवों को प्रसाद स्वरुप दिया जाता है। वर्तमान समय में वृक्ष अभी भी गुरुद्वारा के परिसर में खड़ा है । इस गुरुद्वारे के निकट ढ़ेरनाथ jee का मंदिर स्थित है |

बैसाखी पूर्णिमा के अवसर पर यहाँ विशाल मेले का आयोजन किया जाता है | शान्ति का केन्द्र होने के साथ-साथ यह गुरूद्वारा दशकों से आपसी भाईचारे का भी प्रतीक है ।

रीठा साहिब कैसे पहुँचे? How to reach Reetha Sahib Gurudwara
गुरुद्वारा रीठा साहिब लोहाघाट से 64 किमी. की दूरी पर है। यहाँ रोड द्वारा पहुँचा जा सकता है. यहाँ नॅशनल हाइवे नंबर 125 से पहुँचा जा सकता है. यहाँ से नज़दीक रेलवे स्टेशन, टनकपुर रेलवे स्टेशन है जो यहाँ से 142 किमी दूर पर स्थित है. काठगोदाम रेलवे स्टेशन से 160 किमी की दूरी पर स्थित है. रीठा साहिब रोडवेज बस या प्राइवेट टेक्सी से पहुँचा जा सकता है. यहाँ रोड द्वारा दो अलग अलग रूट से पहुँचा जा सकता है-
टनकपुर—> चंपावत—->लोहाघाट —->रीठा साहिब
हल्द्वानी—->देवीधुरा—–>रीठा साहिब

कैसे पहुंचें:

बाय एयर
मीठा रीठा साहिब से निकटतम हवाई अड्डा पंतनगर है जो कि उत्तराखंड राज्य के नैनीताल जिले में 160 किमी दूर स्थित है। पंतनगर हवाई अड्डे से मीठा रीठा साहिब तक टैक्सी उपलब्ध हैं। पंतनगर एक सप्ताह में चार उड़ान दिल्ली के लिए उपलब्ध है |

ट्रेन द्वारा
मीठा रीठा साहिब चम्पावत से 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। टनकपुर रेलवे स्टेशन से मीठा रीठा साहेब तक टैक्सी और बस आसानी से उपलब्ध हैं। टनकपुर लखनऊ, दिल्ली, आगरा और कोलकाता जैसे भारत के प्रमुख स्थलों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। ट्रेन टनकपुर रेलवे स्टेशन के लिए उपलब्ध होती है और रीठा साहिब टनकपुर के साथ मोटर वाहनों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।

सड़क के द्वारा
मीठा रीठा साहिब उत्तराखंड राज्य और उत्तरी भारत के प्रमुख स्थलों के साथ मोटर वाहनों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। आईएसबीटी आनंद विहार की बसें टनकपुर, लोहाघाट और कई अन्य गंतव्यों के लिए उपलब्ध हैं, जहां से आप आसानी से स्थानीय कैब या बस तक पहुंच सकते हैं

स्टे
मीठा रीठा साहिब में होटल और साथ ही गुरुद्वारा में आवास की सुविधा है।

चितई गोलू देवता मंदिर अल्मोड़ा

यहाँ सत्य के लिए न प्रमाण दिखाने होते, न साथ अपने गवाह लाने होते।
शृद्धा, विश्वास और पवित्र हृदय से जो भी आते, न्याय गोलू देवता से पाते।

Haldwani to Garjia Temple

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हल्द्वानी से कालाढूंगी, कॉर्बेट म्यूजियम, कॉर्बेट वाटर फॉल, बैलपडाव, रामनगर होते हुए गर्जिया मंदिर के खुबसूरत सफ़र के बारे में विस्तृत जानकारी देता विडियो।

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Mukteshwar, Nainital

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मुक्तेश्वर एक छोटा सा साफ़ सुथरा और शांत पहाड़ी गाँव है, जहाँ आपको असीम शांति, वन क्षेत्र, किसी भी अन्य हिमालयी छेत्र की तरह ही सीधे व सरल ग्रामीण, और शुद्ध हवा और असीम मानसिक शांति मिलती है, यहाँ से दिखने वाले हिमालय श्रंखला के बेजोड़ दृश्य, अपने शांत माहौल और शीत मौसम व स्वच्छ वातावरण, बाज और देवदार के घने जंगल और यहाँ चौली की जाली नामक स्थान से दिखने वाले असीम व अद्भुत घाटी के दृश्य और मुक्तेश्वर महादेव मंदिर से श्रद्धालुओं को मिलती असीम उर्जा के लिए ट्रैकिंग, रीडिंग, व्रित्तिंग, बर्ड वाचिंग, आदि, यहाँ पर्यटकों द्वारा की जाने वाली कुछ एक्टिविटीज है.

मुक्तेश्वर पहुचने के मार्ग में दिखने वाले दृश्य भी काफी खुबसूरत और लुभावने हैं. सफ़र करते हुए दिखने वाले आकर्षक दृश्यों की सुन्दरता आपका दिल जीत लेती है. मुक्तेश्वर नाम दो संस्कृत शब्द से निकला है “मुक्ति और ईश्वर” । यानी यहाँ आप सांसारिक आपाधापी से दूर मुक्त हो स्वयं को इश्वर के करीब पाते हैं.

मुक्तेश्वर देवदार, बांज, काफल, मेहल आदि के सुंदर और घने आरक्षित वनों से घिरा है। यहाँ IVRI इंडियन वेतेर्निटी रिसर्च इंस्टिट्यूट भी है, जहाँ जानवरों पैर रिसर्च (खोज) की जाती है ये इंस्टिट्यूट 1893 में अंग्रेजों द्वारा यहाँ बनवाया गया था यहाँ एक म्यूजियम और लाइब्रेरी भी है जहाँ जानवरों पर रिसर्च से पुराने डॉक्यूमेंट और किताबें संभाली गयी हैं

मुक्तेश्वर धाम एक प्राचीन शिवमंदिर है, जिसके नाम पर ही इस इलाके को मुक्तेश्वर कहा जाता है। यहाँ से हिमालय और हरियाली भरी घाटियों का दृश्य बहुत खूबसूरत दिखाई पड़ता है।

मुक्तेश्वर बाजार से जो हालाकिं ज्यादा बड़ी नहीं है, से महज २ किलोमीटर की दुरी पर मुक्तेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है, जो सडक से लगभग 400 – ५०० मीटर के दुरी जिसमें आपको कुछ सीडियां भी चढ़नी होती है, के बाद ये मंदिर स्थित है।

Almora City Tour

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व्यस्त दिनचर्या और थकान भरी जीवनशैली के आप used to (अभ्यस्त) हो गये हों, पर कभी आपको लगे, कि आपने, अपने और अपनों के साथ, अच्छा वक़्त बिताना है, तो almora जो की समुद्र तल से लगभग 6,106 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, आपके लिए एक उपयुक्त स्थान हो सकता है। ये नगर जहाँ एक और ऐतिहासिक महत्व का है, वही सांस्कृतिक, अध्यात्मिक स्थल होने के साथ साथ एक जाना माना पर्यटक स्थल भी है।
आईये रूबरू होते है इस शहर से, बने रहिये इस सफ़र में मेरे साथ, hello फ्रेंड्स मै स्नेहा, आपका स्वागत है अल्मोड़ा नगर के इस टूर में…।
इस जगह से राईट हैण्ड साइड को डोली डाना गोल्जू मंदिर है जो डेढ़ से दो किलोमीटर की soft​ ट्रैकिंग के बाद आता है। ​




अल्मोड़ा, 16 वीं शताब्दी में कुमाऊं साम्राज्य पर शासन करने वाले चंदवंशीय राजाओं की राजधानी थी। एक कथा के अनुसार यह कहा जाता है कि कौशिका देवी ने शुंभ और निशुंभ नामक दानवों को इसी क्षेत्र में मारा था।

head पोस्ट ऑफिस, रैमजे इंटर कॉलेज, एडम्स गर्ल्स inter कॉलेज, GIC आदि कुछ ब्रिटिश कालीन इमारतों में से एक हैं
चितई, नंदा देवी मंदिर, रघुनाथ मंदिर, हनुमान मंदिर, मुरली मनोहर मंदिर, भैरब मंदिर, पाताल देवी, कसारदेवी, उल्का देवी, बानरी देवी, बेतालेश्वर, स्याही देवी , जागेश्वर, डोलीडाना आस्था के केन्द्र इस शहर की धरोहर हैं




​​अल्मोड़ा में, आवागमन के लिए, kmou, roadways की बसें aur taxi asani se uplabdh ho jati hai हैं । जनपद का सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम, यहाँ से लगभग 90० किमी० की दूरी पर, एवं निकटतम एअरपोर्ट पंतनगर लगभग 125 किमी० की दूरी पर स्थित है. Almora se kuch prmukh sehro ki duri ap screen mai dekh skte hai

अल्मोड़ा कुमाऊ का एक प्रमुख शहर है जहाँ से कुमाओं और गडवाल के प्रमुख जगहों के लिए मार्ग जाता है जैसे नैनीताल, हल्द्वानी, पिथोरागढ़, बागेश्वर, द्वाराहाट, रानीखेत, कौसानी, जागेश्वर, कर्णप्रयाग, चमोली, आदि को, स्क्रीन में आपको इन स्थानों की अल्मोड़ा से दुरी का चार्ट दिख रहा है

इतिहासकारों की मान्यता है कि, सन् 1563 ई. में चंदवंश के राजा बालो कल्याणचंद ने आलमनगर के नाम से इस नगर को बसाया था। चंदवंश की पहले राजधानी चम्पावत थी। कल्याणचंद ने इस स्थान के महत्व को भली-भाँति समझा। तभी उन्होंने चम्पावत से बदलकर इस आलमनगर (अल्मोड़ा) को अपनी राजधानी बनाया।

सन् 1563 से लेकर 1790 ई. तक अल्मोड़ा का धार्मिक भौगोलिक और ऐतिहासिक महत्व कई दिशाओं में अग्रणी रहा। इसी बीच कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं राजनैतिक घटनाएँ भी घटीं। साहित्यिक एवं सांस्कृतिक दृष्टियों से भी अल्मोड़ा समस्त कुमाऊँ अंचल का प्रतिनिधित्व करता रहा।
सन् १७९० ई. से गोरखाओं का आक्रमण कुमाऊँ अंचल में होने लगा था। गोरखाओं ने कुमाऊँ तथा गढ़वाल पर आक्रमण ही नहीं किया बल्कि अपना राज्य भी स्थापित किया। सन् 1896 ई. में अंग्रेजो की मदद से गोरखा पराजित हुए और इस क्षेत्र में अंग्रेजों का राज्य स्थापित हो गया।
स्वतंत्रता की लड़ाई में भी अल्मोड़ा के विशेष योगदान रहा है। शिक्षा, कला एवं संस्कृति के उत्थान में अल्मोड़ा का विशेष हाथ रहा है।
कुमाऊँनी संस्कृति की असली छाप अल्मोड़ा में ही मिलती है – अत: कुमाऊँ के सभी नगरों में अल्मोड़ा ही सभी दृष्टियों से बड़ा है।




जनपद की मुख्य नदियों में रामगंगा, कोसी तथा सुयाल नदियां हैं । जनपद के प्रमुख कृषि उत्पाद चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा, चाय, सेब, आड़ू, खुबानी, पूलम हैं। तथा मयूर, ग्रे बटेर, काला तीतर, चिड़िया, चकोर, मोनाल तीतर, बाघ, चीतल, तेंदुआ, लोमड़ी, गोराल, हिम तेंदुआ, काले भालू जनपद में पायी जाने वाली जीव जन्तुओं की मुख्य प्रजातियां हैं। जनपद का मौसम सर्दियों में ठण्डा तथा गर्मियों में सुहावना रहता है। ऊंचाई वाले स्थानों में सर्दियों में जमकर हिमपात होता है।। जुलाई से सितंबर तक जनपद में भारी वर्षा होती है ।
अब ये बायीं और दींन दयाल उपाध्याय पार्क…