व्यस्त दिनचर्या से कुछ समय निकालकर अपने और अपनों के साथ ठहरना चाहें, तो अल्मोड़ा एक अच्छा अनुभव दे सकता है। यह पहाड़ी नगर अपने इतिहास, संस्कृति, मंदिरों और बाजारों के कारण अलग पहचान रखता है। यहाँ घूमने का आनंद केवल किसी
यह दुनिया मनुष्यों जितनी ही पक्षियों, वन्यजीवों और पेड़-पौधों की भी है। बिनसर की यात्रा इस बात को करीब से महसूस करने का अवसर देती है। अल्मोड़ा के पास स्थित इस अभयारण्य में बड़े दर्शनीय स्थलों की सूची से अधिक महत्व जंगल क
अल्मोड़ा से पिथौरागढ़ के सफर में केवल दो नगर नहीं जुड़ते। रास्ते में मंदिर, छोटे बाजार, जंगल और नदी-घाटियाँ मिलती हैं। इस बार हम आदि कैलाश यात्रा के दौरान केएमवीएन के समूह के साथ इस मार्ग से गुजरे।
पिछोला और सिटी पैलेस के आसपास एक दिन रखें, फिर फ़तेहसागर या सज्जनगढ़ के लिए समय निकालें। ठहरने की जगह से लेकर झील के किनारे रुकने तक, दो दिन का व्यावहारिक सुझाव।
बागेश्वर जिले का कौसानी हिमालय के खुले दृश्यों, अनासक्ति आश्रम और शांत पहाड़ी वातावरण के लिए जाना जाता है। मौसम साफ हो तो दूर के शिखर दिखाई देते हैं; बादलों के समय आसपास की हरियाली और धीमा कस्बाई जीवन भी यात्रा को अर्थ द
अल्मोड़ा से आगे धौलछीना का छोटा बाजार कुछ देर रुकने का मन कराता है। आसपास के पहाड़, स्थानीय भोजन और कस्बे की सहज दिनचर्या इस जगह का अनुभव बनाते हैं। यहाँ की यात्रा में बहुत कुछ करने के बजाय धीरे घूमना अधिक अच्छा लग सकता
यह दुनिया मनुष्यों जितनी ही पक्षियों, वन्यजीवों और पेड़-पौधों की भी है। बिनसर की यात्रा इस बात को करीब से महसूस करने का अवसर देती है। अल्मोड़ा के पास स्थित इस अभयारण्य में बड़े दर्शनीय स्थलों की सूची से अधिक महत्व जंगल क
नैनीताल में तल्लीताल की ओर से प्रवेश करते हुए टैक्सी स्टैंड, बस पड़ाव और आसपास के होटल दिखाई देते हैं। आगे झील के साथ चलती मॉल रोड नगर की सबसे परिचित छवि सामने लाती है।
मुक्तेश्वर के रास्ते पर चलते हुए ही यात्रा का आनंद शुरू हो जाता है। पहाड़ी मोड़, जंगल और बीच-बीच में खुलते दृश्य मंज़िल की भूमिका बना देते हैं। यहाँ पहुँचकर कुछ देर बिना जल्दबाजी के रहने का मन होता है।
देहरादून के ऊपर लगभग दो हजार मीटर की ऊँचाई पर बसी मसूरी की पहचान पहाड़ी दृश्यों, पुराने भवनों और व्यस्त माल रोड से है। ‘पहाड़ों की रानी’ कहे जाने वाले इस शहर को देखने का अच्छा तरीका है कुछ रास्ते पैदल चलना और आसपास के स्
कौसानी से बैजनाथ की इस यात्रा में पहाड़ी दृश्य, खेतों में काम करते लोग और रास्ते के छोटे बाजार साथ चलते हैं। मूल सफर में लगभग 16 किलोमीटर की दूरी तय करने में करीब 50 मिनट लगे थे।
हल्द्वानी से नैनीताल की सड़क यात्रा लगभग 40 किलोमीटर की है। रानीबाग के बाद पहाड़ी मोड़ और चढ़ाई शुरू हो जाती है। सामान्य परिस्थितियों में डेढ़ से दो घंटे लग सकते हैं, लेकिन भीड़ और मौसम के अनुसार अधिक समय रखें।
चित्रकूट का परिचय रामकथा से अलग नहीं किया जा सकता। धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास का लंबा समय यहाँ बिताया था। घाटों, मंदिरों और आसपास के स्थलों में इसी स्मृति की झलक मिलती है।
भीमताल की पहचान उसकी झील और उसके आसपास बसे नगर से है। पानी के बीच दिखाई देता छोटा द्वीप, किनारे से गुजरती सड़क और पहाड़ियों का परिवेश यहाँ आने वालों को ठहरने का कारण देते हैं।
ग्वालदम और बधानगढ़ी की इस यात्रा में छोटे पहाड़ी कस्बे की सहजता भी है और ऊँचाई पर पहुँचने का संतोष भी। बधानगढ़ी में माँ दक्षिणेश्वर काली का मंदिर है। खुले मौसम में यहाँ से हिमालय, घाटियाँ और दूर-दूर तक बसे गाँव दिखाई देत
कैंची धाम बाबा नीम करौली महाराज से जुड़ा प्रसिद्ध आश्रम है। यहाँ दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। शांत परिसर में कुछ समय बिताने का अपना अनुभव है, लेकिन यात्रा की तैयारी में रास्ते और भीड़ का ध्यान रखना भी ज़रूरी है।
पिछोला और सिटी पैलेस के आसपास एक दिन रखें, फिर फ़तेहसागर या सज्जनगढ़ के लिए समय निकालें। ठहरने की जगह से लेकर झील के किनारे रुकने तक, दो दिन का व्यावहारिक…
चमोली जिले के गोपेश्वर में महादेव का प्राचीन मंदिर नगर के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हमारी यात्रा में बारिश और धुंध के बीच बाजार से मंदिर की ओर पैदल चले। दुकानों और घरों के बीच से होकर पत्थर के पुराने परिसर में पहुँचन
बद्रीनाथ से लगभग तीन-चार किलोमीटर आगे माणा गाँव है। ऊँचे पहाड़, पत्थर के घर, संकरी गलियाँ और आसपास बहती नदियाँ इस हिमालयी बस्ती का परिवेश बनाते हैं। यहाँ की यात्रा केवल किसी प्रसिद्ध स्थल तक पहुँचना नहीं, सीमांत क्षेत्र